Kabir Satsang Jiv Kalyan Marg 01

इस Kabir Satsang में बताई गई हैं की इस संसार सृष्टि में चौरासी लाख जीव-योनियां  हैं। उनमें सबसे उत्तम मनुष्य योनि …

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Kabir Das Ji ka Jivan Parichay | कबीर दास जी का जीवन परिचय

Kabir Das Ji ka Jivan Parichay

Kabir Das Ji ka Jivan Parichay के बारे में बात किया जाय तो कबीर दास जी इस धरातल पर स्वयम प्रगट हुए थे। निरु नाम का जुलाहा कशी में रहता था , निरु का शादी नीमा से हुआ था। एक समय निरु अपनी पत्नी नीमा का गौना कराकर ले कर आ रहा था ,वो समय ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष एवं बरसाइत पूर्णिमा तिथि थी। 

Kabir Das ka Jivan Parichay बिसतार से 

नारि लिवाय आय मग माहि। जल अचवन गई बनिता ताही।। 

ताल माहि पुरइन पनवारा। शिशु होए मैं तहं पगु धारा।।

तहां जस बालकै रहुँ पौडाई। करौं कुतुहल बाल स्वाभाई।। 

निरु अपनी पत्नी नीमा को लिवाकर मार्ग में आ रहा था , तो ऐसा हुआ की नीमा को प्यास लगी ,उनके मार्ग के समीप काशी लहरतारा तालाब था।  नीमा पानी पिने की इच्छा से तालाब के समीप गयी , उन्होंने तालाब के जल से अपनी प्यास बुझाई और जैसे ही वो तालाब से बाहर निकलने को मुड़ी तभी उनका ध्यान एक नौजात शिशु पर पड़ी जो तालाब में कुछ दूर पर कमल के पुष्प पर कौतुहल कर रहा था।

नीमा उस बच्चे के पास गयी वो बच्चा इतना सूंदर था और उसके चेहरे पर अद्भुत चमक थी , नीमा ने उस बच्चे को अपनी गोद में उठा ली और इधर – उधर देखने लगी के ये किसका बच्चा है लेकिन वहां कोई और नहीं दिखा।  फिर काफी देर हो गयी तो निरु राह देख – देख कर तालाब पर पहुंचे, नीमा के गोद में बच्चा देख निरु चौक कर पूछे ये बच्चा कहाँ से लायी।

नीमा ने सारी बात निरु को बता दी, निरु कुछ देर सोच कर बोले के इस बच्चे को जहाँ से उठायीं हो उसी स्थान पर वापस रख आओ, नीमा बोली ऐसा क्यों बोल रहे हो, निरु ने कहाँ अभी तुम्हे गवना करा कर ला रहा हूँ गोद में बच्चा देख कर लोग क्या क्या नहीं बोलेंगे इन बातों पर दोनों दम्पति में नोकझोक चल रहा था।  तभी उस बचे ने बोला मै अगले जन्म के किसी उद्देश्य से तुम्हारे पास आया हूँ मुझे अपने साथ ले चलो। इसके पश्चात निरु नीमा उस बालक को अपने घर ले आये।

Kabir Das Ji ka Jivan Parichay

Kabir Das Jivan Parichay कबीर दास जीवन परिचय

सद्गुरु कबीर साहेब ने परम संतरूप में प्रकट होकर अपनी सहज-सरल एवं गहन-गम्भीर वाणियों के द्वारा जो सदाचार, सत्यज्ञान तथा मोक्ष का सदुपदेश किया, उससे निस्संदेह मानवता को असीम सुख एवं अपार बल मिला और सत्यधर्म की जाग्रति तथा वृद्धि हुई। व्यवहार और परमार्थ के सब रहस्य एवं अंगों से पूर्ण उनकी उत्कृष्ट सदाबहार शब्द-साखियां लोकप्रसिद्ध हैं। उनके शब्द-शब्द में अत्यंत गूढ़ भाव एवं गम्भीर ज्ञान सन्निहित है। उनसे उनकी सहजता, सरलता तथा यथार्थता का स्पष्ट बोध होता है। अपने सहज स्वाभाविक सद्गुणों, निष्पक्ष ज्ञान- विचारों एवं सर्वकल्याणकारी शब्द- उपदेशों से वे जन-जन के प्रिय तथा परम वन्दनीय हैं।

Kabir Saheb

जैसे आकाश में असंख्य टिमटिमाते तारों के बीच में एक चन्द्रमा चमकता हुआ शोभित होता है और उसकी श्वेत चांदनी से रात्रि भी शोभा पाती है, वैसे अनेक संत-महापुरुषों के नामों में एक नाम ‘कबीर’ अद्वितीय ढंग से चमकता- शोभता है और उसकी दिव्य चमक से समूचे संत-क्षेत्र की महिमा बढ़ती है। वस्तुतः ‘कबीर’ नाम है-उस सत्यता, पवित्रता एवं निष्कामता का जिसकी संगति में आने वाला हर कोई जिज्ञासु ‘साधु’ हो जाता है।

सद्गुरु कबीर साहेब का उपदेशित ज्ञान ऐसा चमत्कारी है कि जो उसे ठीक से ग्रहण करता है, वह उसके घट के पट खोलकर उसे नया मुक्त एवं श्रेष्ठ जीवन प्रदान करता है। प्रायः देखा जाता है कि जीवन-सुधार या कल्याण के लिए ज्ञान- सदाचार की बात हो या आत्मा-परमात्मा की चर्चा, भजन-कीर्तन हो या सत्संग-

प्रवचन, वहां पर कबीर साहेब के नाम के साथ उनके अनमोल वाणी-वचनों का उदाहरण आ ही जाता है। कई बार बड़े जन-समूह एवं धर्म-सम्प्रदायों में मन की शंकाओं का समाधान तथा सत्य का प्रतिपादन करने के लिए भी उनकी सारगर्भित वाणी का आधार लिया जाता है। सचमुच, बात चाहे व्यवहार की हो या परमार्थ की, सर्वथा सत्य पर आधारित कबीर साहेब की बात अकाट्य एवं निराली है, जो सभी के विश्वास को पुष्ट करती है और उसे मानने को बाध्य भी।

सद्गुरु कबीर साहेब के असंख्य साखी शब्दों में समाया हुआ उनका सत्यज्ञानोपदेश अटके-भटके सांसारिक जनों को धर्म एवं कर्तव्य का सही मार्ग दर्शाता है। वह उन्हें निम्न पशुता से उठाकर समुन्नत श्रेष्ठ मानव-जीवन जीने की कला सिखाता है। सम्पूर्ण मानवता को उन्होंने अपने शब्दों में समेटा है। सर्व समानता एवं सर्वहित के सच्चे मानव-धर्म को उन्होंने सविस्तार अपने सरल शब्दों में वर्णित किया है। सही अर्थों में सद्गुरु कबीर साहेब मानवता के परम आदर्श और उनकी समस्त शब्द-वाणियां मानव-कल्याण के दिव्य सूत्र हैं। स्वयं सदा सत्य में प्रतिष्ठित और निर्भय सत्य का उद्घोषक, ऐसा उन जैसी निष्काम-निर्मल छवि वाला पूर्ण संत-सद्गुरु अन्य कोई होगा, कहना कठिन है।

ऐसे अप्रतिम प्रतिभावान, अनंत महिमावान सद्गुरु कबीर साहेब के जीवन-चरित्र के बारे में जानने की प्रबल उत्कंठा संत भक्तों एवं जन-साधारण के अन्तर्मन में जाग्रत होना स्वाभाविक है। इस जानने में बड़ी कठिनाई यह है कि उनके बारे में बहुत लोगों ने विभिन्न प्रकार से कहा है और स्वयं उन्होंने अपने शरीर-सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा। प्रायः संत-महापुरुषों ने अपने सांसारिक जीवन-परिचय के बारे में कुछ कहने-लिखने की आवश्यकता नहीं समझी।

उन्होंने तो केवल निस्वार्थ रूप से सर्वजन हित के शुभ कार्य किए और सर्व-कल्याण की ही बातों को कहा-लिखा। हां, यह बात अलग है कि उनके बारे में उन्हीं के समय के लोगों ने जैसा देखा-सुना या समझा, वैसा कहा-लिखा हो। सद्गुरु कबीर साहेब के बारे में अधिकतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके संत भक्तों का कहा-लिखा हुआ और साहित्यकारों का अपने ढंग का समझा-लिखा मिलता है। स्वयं सद्गुरु कबीर की मूल वाणी में यदि उनके परिचय जैसा कुछ मिलता भी है तो उसका भी गहन आध्यात्मिक अर्थ ही अधिक सिद्ध होता है।

यथा-

हिन्दू कहूं तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।

पांच तत्व का पूतला, गैबी खेलै माहिं ॥

हिन्दू तुरुक के बीच में, मेरा नाम कबीर ।

जिव मुक्तावन कारनै, अविगति धरा शरीर ॥

हम वासी वा देश के, जाति वर्ण कुल नाहिं ।

शब्द मिलावा है रहा, देह मिलावा नाहिं ॥

कबीर का घर शिखर पर, जहां सिलहली गैल ।

पांव न टिकै पपील का, तहां खलकन लादै बैल॥

उपर्युक्त साखियों के भावार्थ से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सद्गुरु कबीर साहेब शरीर एवं शरीर के सम्बन्धों से ऊपर उठे हुए आत्मस्वरूपस्थ थे।

Kabir Das Ji ka Jivan Parichay;

इस संसार को वे अपना देश नहीं मानते थे, अतः इससे उनका कोई लगाव नहीं था। वे अपने-आपको न हिन्दू कहते थे और न मुसलमानादि। पांच तत्व के पुतले शरीर में जो गुप्त आत्मस्वरूप खेलता है, उसी की ओर वे अपने होने का संकेत करते । उस समय के दो बड़े वर्ग हिन्दू और मुसलमान थे, इसलिए उन्हीं को देखते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू-मुस्लिम के बीच में मेरे प्रकट स्वरूप का नाम ‘कबीर’ है।

जीवों को मुक्ताने के लिए ही अविगत पुरुष ने यह शरीर धारण किया है। आगे उन्होंने बताया है कि हम तो उस अलौकिक देश के निवासी हैं, जहां जाति, वर्ण, कुल नहीं होते और जिसका मिलाप शरीर से नहीं, वरन् सार शब्द से होता है। माया-मोह एवं विषय-वासनाओं के धरातल पर वे नहीं थे।

उनका निज घर (निवास-स्थिति) परमात्मस्वरूप-शिखर पर था, जिसके रपटीले मार्ग में चींटी के भी पांव नहीं टिकते। परन्तु वहां संसार के लोग बैल लादकर ले जाना चाहते हैं। कुल मिलाकर सद्गुरु कबीर साहेब अध्यात्म के चरमोत्कर्ष पर थे, जहां

सामान्य दृष्टि से उन्हें नहीं देखा जा सकता। उनका यथार्थ परिचय तो उनकी शब्द- वाणियों में आपूरित उनका सत्यज्ञान ही है। उसके आधार पर उनके देदीप्यमान परम संत जीवन को, उनकी महानता एवं विशिष्टता को किसी हद तक समझा जा सकता है।

परन्तु लोग उनकी शब्द-वाणियों का भी अपने-अपने अनुसार अर्थ लगाते हैं और कुछ दूसरों का अयुक्त-असंगत कहा हुआ बिना विचारे मान लेते हैं। ऐसे ही कुछ कारणों से उनके जीवन चरित्र के बारे में संत-विद्वानों के विभिन्न मत हैं।

किसी ने उनको प्रकृति के अविच्छिन्न एवं अटल नियमों के अन्तर्गत शरीर से सामान्य तो किसी ने सर्व बंधनों से मुक्त असामान्य दिव्य स्वरूप में माना है।

परन्तु प्रायः सभी ने उनके ठोस आध्यात्मिक ज्ञान-विचार एवं सत्य सिद्धान्त के आगे शीश झुकाते हुए उन्हें युग का महान सत्पुरुष तथा सत्यज्ञान प्रदाता परम संत- सद्गुरु स्वीकार किया है।

वह युग घोर विषमताओं, संकीर्णताओं एवं कुनीतियों के अंधकार से युक्त था, जिसमें सद्गुरु कबीर साहेब महान प्रकाशस्वरूप होकर चमके। सम्भवतः उस युगांधकार को चीरने और आगे तक के जन-समाज को जगाने के लिए ही उनका प्राकट्य हुआ था।

समझना चाहिए कि सद्गुरु कबीर साहेब जैसे समुज्ज्वल परमात्म-स्थिति के संत-महापुरुष सामान्य जीवों की भांति सांसारिक भोगों को भोगने के लिए जन्म नहीं लेते। निश्चित ही विधि-विधान से उनके जन्म अथवा

प्राकट्य का कोई विशेष प्रयोजन होता है। मुख्यतः वे लोकोपकार, परहित एवं परमार्थ के लिए ही प्रकट होते हैं। सुप्रसिद्ध संत-महात्माओं एवं असंख्य भक्तों की मान्यता है और प्रसिद्ध कबीरपंथी ग्रंथों में यह वर्णित है कि सद्गुरु कबीर साहेब का प्राकट्य सत्यज्ञान द्वारा जीवों को चेताने, उनका उद्धार करने और इस लोक में सत्य धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए हुआ।

सद्गुरु कबीर साहेब का प्राकट्य भारतीय इतिहास के मध्य युग में हुआ। उस समय भारत में मुसलमानों का राज्य था। उनके इस्लाम का ही सर्वाधिक बोलबाला था। कट्टरपंथी मुसलमान अपने मजहब को फैलाने तथा उसे मनवाने के लिए अन्य मतावलम्बियों पर मनमाना अत्याचार करते थे।

अन्याय-पाप का खुला विस्तार हो रहा था। असत्य का चलन- प्रदर्शन था और सत्य जैसे कहीं लुप्त हो गया था। सब ओर धर्म एवं सम्प्रदाय की विद्वेषाग्नि भड़क रही थी। धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े होते रहते थे और उनका बड़ा रूप होने पर मानव का रक्त बहाया जाता था।

परस्पर वैमनस्य बढ़ रहा था तथा जनमानस में अशांति छाई थी। प्रपंच- पाखण्ड एवं आडम्बर जोरों पर थे। धर्म के ठेकेदार पंडित-मौलवी जनसाधारण को बहकाते हुए अपनी स्वार्थपूर्ति में लगे हुए थे। अंधविश्वासों एवं रूड़ कुरीतियों की जड़ता-दासता से जन-जन दिशाहीन हो चला था।

छूत-अछूत एवं ऊंच-नीच के भेद-भावों से मानव-समाज छिन्न-भिन्न हो रहा था। रात-दिन दुर्बल दीन-होन जनों का शोषण होने से उनका जीना कठिन हो रहा था। परन्तु इस सबके विरुद्ध कोई समर्थ व्यक्ति स्पष्ट कहने वाला न था। मानवता त्रस्त एवं पीड़ित थी।

ऐसी विषमतापूर्ण, विकराल दुख-स्थिति में भक्त सज्जनों, दीन जनता तथा इस धरती की समग्र मानवता का निज रक्षा के लिए अपने इष्ट (त्राता) को पुकारना, प्रार्थना करना स्वाभाविक था। उस कठिन काल में समाज एवं धर्म की दुर्दशा देखकर तथा मानवता की पीड़ा समझकर मानो सबके स्वामी सत्पुरुष- परमात्मा पिघल गए।

उन्होंने उन सबकी पुकार प्रार्थना सुन ली। जिसके परिणामस्वरूप उस क्रूर काल को प्रताड़ने, असत्य को रौंदने एवं सत्य को सामने लाने वाले ज्ञान मोक्ष प्रदाता सद्गुरु-सत्यपुरुष (कबीर) के प्राकट्य का यह शुभावसर आया, जिसकी बहुत पहले से प्रतीक्षा की जा रही थी। कहा गया है-

Kabir Das ka Jivan Parichay;

सतगुरु कबीर प्रकट हुए

Kabir Das Biography in Hindi

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार इक ठाठ ठये ।
ज्येष्ठ सुदी बरसावत को, पूरणमासी प्रगट भये ॥

Kabir Das Jivan Parichay;

सद्गुरु के प्राकट्य के बारे में जो कबीरपंथ के विद्वत संत-महंतों ने खोज- शोध कर लिखा या कहा है, श्री गरीबदास जी आदि सुप्रसिद्ध संतों ने जो अपने शब्दों में गाया है और बहुसंख्यक भक्तों की जो मान्यता है तथा कबीर मन्सूर आदि ग्रंथों में स्पष्ट वर्णित है, वह इस प्रकार है-

विक्रमी संवत् चौदह सौ पचपन, ज्येष्ठ मास पूर्णिमा, दिन सोमवार को आकाश-मंडल से सत्यपुरुष का दिव्य तेज काशी (उ. प्र.) के लहरतारा तालाब में उतरा। उस समय अंधेरा छाया हुआ था और मन्द वृष्टि हो रही थी। उस तेज से वह तालाब ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगा तथा सब दिशाएं जगमगाहट से पूर्ण हो गईं।

इस अद्भुत दृश्य को वहां पर बैठे श्री अष्टानन्द स्वामी ने देखा। तत्पश्चात उन्होंने उसका समस्त विवरण स्वामी रामानन्द जी को जाकर सुनाया। उधर फिर वह दिव्य तेज मनुष्य के शिशु-रूप में परिवर्तित हो गया और जल के ऊपर खिले कमल-पुष्प पर हाथ-पांव फेंकते हुए किलकारी मारने लगा। यह प्रत्यक्ष बाल- रूप कबीर था। उनके दिव्य प्राकट्य से सम्बद्ध ये पंक्तियां प्रसिद्ध हैं-

गगन मंडल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर ।

जलज माहिं पोढ़न कियो, दोउ दीन के पीर ॥

इसे सुयोग ही समझिए कि उसी समय एक काशी का निवासी नीरू जुलाहा अपनी पत्नी नीमा का गौना कराकर उक्त लहरतारा तालाब के समीप के ही रास्ते से जा रहा था। उसकी पत्नी नीमा को बड़ी प्यास लगी थी, इसलिए वह उस तालाब पर जल पीने गई। जल पीने के बाद उसने वहां इधर-उधर दृष्टि डाली तो खिले हुए कमल पुष्प पर एक अति सुन्दर तेजस्वी शिशु को किलकारी मारते देखा। वह उसके पास चली गई तो हृदय में अत्यंत स्नेह उमड़ पड़ा।

 

तभी उसने उस शिशु को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। फिर वह उस शिशु को लिए हुए अपने पति नीरू के पास आई और उसे वह प्यारा शिशु दिखाया। उस शिशु के सम्बन्ध में नीरू के पूछने पर उसने उस शिशु के लहरतारा तालाब के कमल पुष्प पर देखे -पाये जाने की अनूठी बात बता दी।

इसके साथ ही नीमा ने अपने दृढ़ निश्चय से कहा कि अब हम इस बालक को अपने पास ही रखेंगे। नीरू के बहुत मना करने तथा समझाने पर भी नीमा ने उस शिशु को अपने से अलग नहीं किया। अन्ततः वे पूरी तरह सोच-विचारकर उसे अपने घर ले आए और खुशी-खुशी उसको पालने-पोसने लगे। उन्होंने जब उस बालक का नामकरण मौलवी एवं पंडित के द्वारा कराया तो उसका नाम ‘कबीर’ रखा गया। वही बालक ‘कबीर’ आगे चलकर जगत में परम संत-सद्गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

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दम्पत्ति नीरू-नीमा जुलाहे के यहां बालक कबीर समय के साथ-साथ पलते-बढ़ते गए। उनका तेजोमय स्वरूप बड़ा सुन्दर एवं आकर्षक था। नीरू- नीमा और उनके आस-पास के सब लोगों को रोज-रोज उनकी आश्चर्यपूर्ण बाललीला देखने को मिलती थी। स्वाभाविक रूप से ही बालक कबीर अद्भुत साहसी, तीव्र मेधावी और असाधारण गुणों से भरपूर थे। प्रसिद्ध संत श्री गरीबदास जी अपनी वाणी में कहते हैं कि काशी में कबीर जब पांच वर्ष के हुए, तब वे अद्भुत कला, ज्ञान-ध्यान एवं दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न थे। यथा-

पांच बरस के जब भये, काशी मांझ कबीर।
गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुण सीर ॥

इतनी अल्प आयु में बालक रूप कबीर साहेब का इतना महान प्रतिभाशाली होना सबको आश्चर्य में डालता था। उनकी सीधी-सरल सत्य एवं ज्ञान की बातों को सुनकर बड़े-बड़े पंडित-मौलवी ढीले तथा कमजोर पड़ जाते थे। उन्हें उनकी बातों का उत्तर न सूझ पड़ता था। ऐसे ही बहुत लोग उनके ज्ञान-विचारों का लोहा मानते थे। अपनी विशिष्टता से कबीर लोगों के हृदयों में उतरते गए।

संसार में आए सभी लोगों को गुरु की आवश्यकता है, क्योंकि बिना गुरु से ज्ञान पाए सांसारिक माया-मोह, विषय-वासनाओं एवं राग-द्वेषादि से छूटना तथा कल्याण-मोक्ष का पाना सम्भव नहीं है। परन्तु कबीर साहेब सामान्य संसारी लोगों की भांति किसी आसक्ति या बंधन में नहीं पड़े थे।

वे तो स्वतः ही संसार से विरक्त, सत्यज्ञान सम्पन्न एवं सदा जाग्रत मुक्त स्वरूप थे, अतः उन्हें ज्ञान एवं मुक्ति पाने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता न थी। फिर भी उन्होंने गुरु-पद का गौरव बढ़ाने और लोक-मर्यादा को निभाने के लिए उस समय के सुप्रसिद्ध विद्वान वैष्णव स्वामी श्री रामानन्द जी को गुरु किया।

यद्यपि स्वामी रामानन्द जी स्वेच्छा से कबीर साहब को अपना शिष्य नहीं बनाना चाहते थे, तथापि कबीर साहेब ने अपने एक अद्भुत प्रकार से स्वयं को सामने लाकर स्वामी रामानन्द के मुख से निकले ‘रामनाम’ को जानकर उन्हें अपना गुरु मान लिया।

Kabir Das Ji ka Jivan Parichay

रामानंद स्वामी को इस प्रकार गुरु कीऐ;Kabir Das Ji ka Jivan Parichay

स्वामी रामानन्द जी को गुरु-रूप में स्वीकारने पर भी कबीर साहेब उनकी मत मान्यताओं से अलग रहे। कबीर साहेब के अविनाशी राम तथा उनकी निष्काम सहज भक्ति-साधना स्वामी रामानन्द जी के दाशरथि राम, मूर्तिपूजा एवं विभिन्न कर्मकांडों से भिन्न थी। फिर भी कबीर साहेब विनम्र भाव से स्वामी रामानन्द जी को गुरु-रूप में बराबर सम्मान देते थे। समय-समय पर उन्होंने अपनी गम्भीर ज्ञानवार्त्ता और सत्य गुरु-भक्ति का परिचय देकर स्वामी रामानन्द जी को संतुष्ट एवं प्रसन्न किया।

इतने पर भी सद्गुरु कबीर साहेब और स्वामी रामानन्द जी के ज्ञान-सिद्धान्त का अन्तर देखते हुए उनका गुरु-शिष्य मर्यादा में होना कठिन जान पड़ता है। कहीं पर तो कबीर साहेब ही अपनी सारगर्भित निर्णय बात को स्वामी रामानन्द को उपदेशात्मक रूप से कहते हैं और उनके न मानने पर जोर से उलाहना देकर उन्हें समझाते हुए लगते हैं। 

रामानन्द रामरस माते। कहहिं कबीर हम कहि कहि थाके ॥

अर्थात् “स्वामी रामानन्द कल्पित राम एवं दाशरथि राम के भाव-रस में मोहे

रहे, मैं उन्हें कह-कहकर थक गया। परन्तु वे हृदय में रमे अविनाशी आत्माराम को नहीं देखते-समझते हैं।” ऐसी स्थिति में यह कैसे माना जाए कि कबीर साहेब

के गुरु रामानन्द थे ? बस यही कहा जा सकता है कि उन्होंने लोक-मर्यादा के लिए ही स्वामी रामानन्द को गुरु किया होगा।

समय के साथ-साथ चलते-बढ़ते हुए सद्गुरु कबीर साहेब अपने निर्मल, समुज्ज्वल ज्ञान-विचारों से सूर्य सदृश्य उजागर हुए। उनके समुन्नत उत्कृष्ट जीवन में धर्म-कर्म सम्बन्धी ऐसी कई अनूठी घटनाएं घटीं जिनसे सब ओर उनका बहुत नाम हुआ और उन्हें यश मिला। घर-संसार से उनका कोई लगाव न था।

न उन्हें किसी से कुछ लेना-देना था। वे अपने-आप में पूर्ण निश्चिंत फक्कड़ मस्त स्वभाव के थे। परहित एवं परमार्थ के पथ पर चलना ही उन्हें अच्छा लगता था। वे अपने-आप के राम में मग्न रहते और लोगों को सत्य-तथ्य से अवगत कराते थे। उन्हें उनकी भूल एवं उनके मोह-अज्ञान को बता-समझाकर उनसे छुड़ाते थे।

वे सदा सत्य में प्रतिष्ठित एक सजग प्रहरी थे, अतएव सार्वभौम सत्य की उद्घोषणा करते हुए सबको जगाते चेताते थे। सबको समान रूप से सुख-शांति मिले, सब सदाचार-सत्यज्ञान के पथ पर चलें और इस संसार सागर से उद्धार पायें, यही उनके जीवन का विशेष प्रयोजन था ।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे सद्गुरु कबीर साहेब अपनी परम ज्ञानस्वरूप स्थिति में अधिकाधिक प्रतिभासित होते गए और सारे जन-समाज में छाते गए। विशेषतः संत भक्तों के बीच में वे सर्वाधिक सम्मानित प्रशंसित हुए। दिन-दिन उनके तेजोमय स्वरूप एवं सार ज्ञान की प्रसिद्धि सब ओर होने से बहुत लोग दूर-दूर से उनका ज्ञान-सत्संग सुनने तथा अपनी भ्रम-शंकाओं को मिटाने के लिए उनके पास आने लगे।

स्वयं सद्गुरु कबीर साहेब भी दया-भाव से लोगों की भलाई करने, उन्हें बुराइयों के संकट से उबारने और अपने सत्यज्ञान का प्रचार- प्रसार करने के लिए गांव-नगर दूर-दूर घूमने निकलते थे। वे देश-विदेश में गए, जैसा कि उन्होंने बीजक में अपने शब्दों में कहा है-‘देश विदेश हाँ फिरा, गांव- गांव की खोरि।’

उनके घूमने ओर लोगों से मिलने से सम्बद्ध उनकी बहुत-सी कथाएं पढ़ने-सुनने को मिलती हैं। उस समय देश में सबसे बड़े दो ही जाति- सम्प्रदाय- हिन्दू एवं मुसलमान थे, अतएव कबीर साहेब ने उनके नाम अपने शब्दों में लिए हैं। उन दोनों वर्गों के बहुत से हिन्दू-मुसलमान उनके अनुयायी एवं शिष्य हो गए और उनके दर्शाये ज्ञान-पथ पर चल पड़े। इसीलिए वे हिन्दुओं के गुरु और मुसलमानों के पीर कहलाए।

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सद्गुरु कबीर साहेब जहां भी रहे या गए वहां उन्होंने मानव समाज को समुन्नत एवं सुविकसित होने का सदुपदेश किया। वे मानवता का शोषण एवं धर्म का पतन कैसे देख सकते थे ? उन्होंने सबको ऊंचा उठाने, अच्छा खुशहाल बनाने का भरपूर प्रयास किया। उन्होंने अपनी टकसार शब्द-वाणियों में सब भ्रष्टाचार,

व्यर्थ अपवादों एवं परम्परागत तुच्छ मान्यताओं को नकारकर सर्वथा शुद्ध ज्ञान- विचार तथा सदाचार पर आधारित सर्वहित के सच्चे ‘मानव धर्म’ को वर्णित किया है। सम्पूर्ण मानव-जाति की भलाई के लिए उन्होंने सब मानवों की एकता, • समानता और उनके परस्पर सद्भाव एवं सद्व्यवहार पर जोर दिया।

उन्होंने ऊंच- नीच तथा छूत-अछूत के भेदभाव को अनुचित एवं बड़ा दोष बताते हुए समझाया है कि प्रत्येक मानव समादरणीय है और उसे समान रूप से सुख पाने एवं अपना कल्याण करने का अधिकार है।
बीजक के एक शब्द में वे कहते हैं-

एकै त्वचा हाड़ मल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा ।
एक बुन्द से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शूद्रा ॥
रजोगुण ब्रह्मा तमोगुण शंकर, सतोगुणी हरि होई ।
कहहिं कबीर राम रमि रहिये, हिन्दू तुरुक न कोई ॥

“सभी मानव एक जैसे चाम, हाड़, मल-मूत्र, रक्त तथा मांस का शरीर धारण किए हैं। एक ही प्रकार के रज-वीर्य से सृष्टि रची है, फिर कौन ब्राह्मण और कौन शूद्र है। रज-तम-सत् ये तीनों गुण ब्रह्मा, शंकर तथा विष्णु रूप हैं। यहां न कोई हिन्दू है और न मुसलमान, सब समान सजाति हैं।

गुरु शिष्य प्रश्न उत्तर , मन का स्वरुप क्या है 

अपने भीतर के आत्माराम में रमे रहो, वही सुखदायी है।” उनके कथन का गहन आशय यह रहा है कि कोई भी मनुष्य वर्ण-जाति, घर-परिवार एवं धन-बलादि से बड़ा नहीं हो जाता, प्रत्युत सत्याचरण एवं उच्च ज्ञान-विचार से बड़ा तथा श्रेष्ठ होता है। बिना ज्ञान-विचार के केवल खाने-भोगने वाला मनुष्य पशु के समान है।

सद्गुरु कबीर साहेब का उपदेशित ज्ञान निष्पक्ष, निर्मल एवं निभ्रत है। उन्होंने अपनी शब्द-वाणियों में अपना समूचा सत्यज्ञानोपदेश मानव को सामने रखकर किया। उनकी समस्त शब्द-वाणियां मानवमात्र के कल्याण के लिए हैं, जिनमें उन्होंने मानव को मानव-जीवन की महत्ता एवं उसके कल्याण का उपाय बताया है।

उन्होंने समझाया है कि यह मनुष्य जन्म दुर्लभ है, पुनः नहीं मिलता। जैसे पका हुआ फल गिर पड़ता है तो पुनः डाल पर नहीं लगता। अतः इस मनुष्य- जीवन को पाकर यदि अबकी बार चूक गए, अर्थात् उत्तम रहनी गहनी एवं ज्ञान- साधना से अपना कल्याण नहीं कर पाए तो जन्म-मरण के चक्र में दुखों की मार सहनी पड़ेगी। यथा- पड़कर अनंत

मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुरि न दूजी बार। पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुरि न लागै डार ॥ मानुष जन्म नर पायके, चूके अबकी घात । जाय परे भवचक्र में, सहे घनेरी लात ॥ इस संसार सृष्टि में चौरासी लाख जीव-योनियां बताई गई हैं। उनमें सबसे बड़ा मनुष्य है क्यूंकि मनुष्य में सोचने समझने के साथ साथ गुरु भक्ति करने की भी क्रिया इसे और सब से महान बनता है। 

आज से करीब 600 वर्ष पूर्व करीब 1398 ईसवी में सद्गुरु Kabir साहेब वाराणसी के लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर परगट हुए (उनका जन्म नहीं हुआ वो स्वयम प्रगट हुए ) ज्येश्ठ का महीना था

पूरणमासी का रात थाजब सद्गुरु Kabir साहेब प्रगट हुए तब लहरतारा तलाब पूणतः प्रकाशमय हो गया था जो की कुछ दुरी पर बैठे अस्टाॅनन्द स्वामी ध्यान में बैठे थे जब प्रकाश हुआ तब उनकी आँख खुल गयी और वो लीला उन्होंने स्वयम देखा था

सद्गुरु कबीर साहेब उस कमल के पुष्प पर एक बच्चा का स्वरुप लेकर खेलने लगे जब सुबह निरु अपनी पत्नी नीमा को गौना कराकर लेकर  आ रहे थे तो नीमा जी को प्यास लगी तो वो निरु से बोली की मुझे बहुत प्यास लगी है तो निरु बोले के यही थोड़े दूर पर तलाब है जाओ पानी पी कर आ जाओ नीमा जी पानी पिने चल दी जब तालाब पर पहुंची तो वो किनारे से पानी पी ली और

Kabir Das ka Jivan Parichay

अब चलने को हुयी तभी उनका नजर कुछ दूर कमल के पुष्प पर पड़ी एक सूंदर सा बालक कमल के पुष्प पर कौतुहल कर रहा था नीमा जी देखि तो उनसे रहा नहीं गया और वो जा कर उस बच्चे को गोद में उठा ली

और इधर उधर देखने लगी के ये किसका बच्चा हैआवाज भी लगाई लेकिन कोई भी नहीं दिखा फिर नीमा जी उस बालक को लेकर निरु के पास पहुंची निरु बच्चे को देख कर बोले ये किसका बच्चा उठा लायी

तो नीमा जी ने सारी बात बता दी फिर निरु बोले के इस बच्चे को ले जाओ जहा से लायी हो वही छोड़ आओ तो नीमा जी बोलने लगी के नहीं कितना प्यारा बच्चा है मै इसे अपने घर ले चलूंगी तो निरु बोले के नहीं अभी मैं तुम्हे गौना कराकर ला रहा हूँ

और बच्चा साथ में लोग देखेंगे तो क्या -क्या लोग बोलेंगे तुमको अंदाज़ा नहीं है इस बात पर रिक- झिक हो रही थी तभी वो बालक बोल पड़ता है मुझे अपने साथ ले चलो मै पहले के किसी कारन से तुम्हारे पास आया हूँ फिर वो लोग अपने घर ले कर चल दिए

Kabir Das Jivan Parichay

Kabir Das Biography in Hindi, बालक कबीर का नाम रखने के लिए काजी का आना

कुछ दिन बाद बच्चे का नाम रखने के लिए काजी को बुलाया गया काजी जब नाम रखने के लिए कुरान देखता है तो उसमे खुदा का ही नाम आ रहा है वो बार-बार देखता है बार-बार वही नाम आ रहा है तो इस बात पर काजी  काफी गुस्से में झिझक कर बोलता है

ये क्या हो रहा है तभी वो बालक बोलता है मेरा नाम Kabir है दूसरा नाम रखने की जरुरत नहीं है काजी अचंभव में पड़ जाता है और वहा से चला जाता है

बालक कबीर जब थोड़ा बड़ा हो जाता है तब वो किसी ना किसी से सत्संग करने लगता है बालक कबीर की बात सुनकर लोग अचंभव में पड़ जाते है उसी में कुछ लोग कह देते तुम ने गुरु नहीं किया है

Kabir

तो इस ज्ञान का कोई मतलब नहीं है इस बात पर बालक कबीर ने सोचा के गुरु बना लेता हूँ और फिर बालक कबीर रामानंद स्वामी के पास जाता है और बोलता है के स्वामी जी मुझे अपना शिष्य बना लीजिये लेकिन उस समय का ऐसा दौर था

के रामानंद स्वामी छोटी जात वलों का मुँह भी नहीं देखते थे तो वो शिष्य कैसे बना लेते वो दूर से ही मना कर दिए बालक Kabir वाहा से वापस आ जाता है एक दिन की बात है रामानंद स्वामी सुबह 5 बजे तालाब पर असनान करने जाते थे तो उस दिन बालक Kabir तालाब के सीढ़ियों पर लेट गया

जब स्वामी जी असनान करने आये तो अँधेरे में बालक कबीर को नहीं देखे और उनके पाँव से बालक कबीर को चोट लग गयी और वो रोने लगा तभी स्वामी जी बोलेन के चुप हो जा बच्चा राम-राम बोलो सब ठीक हो जायेगा बालक Kabir चुप हो गए और राम-राम कहते हुए वहां से चले गए

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अब बालक Kabir किसी से भी सत्संग करता तो वो लोग पूछते के तुम्हारा गुरु कौन है तो वो बोलते के रामानंद स्वामी मेरे गुरु है अब धीरे धीरे ये बात रामानंद स्वामी के पास पंहुचा के एक छोटी जात का बचा है उसका नाम कबीर है वो बोलता है के मेरे गुरु रमानन्द स्वामी है

स्वामी जी जब ये बात सुने तो नाराज़ होते हुए बोले के उस बालक को बुलाओ मै पूछता हूँ के कब मैंने उसको अपना शिष्य बनाया स्वामी जी के आज्ञा से एक शिष्य जाता है और बुला लाता है बालक Kabir को

जब Kabir को स्वामी जी देखते है तो पूछते है के तुम सबसे बोलते फिरते हो के तुम्हारा गुरु मै हूँ मैंने तुम्हे गुरु दीक्षा तो दी नहीं तो तुम मेरे शिष्य कैसे हुए तो बालक कबीर बोलता है गुरु मंत्र क्या है तो स्वामी जी बोले राम नाम तब कबीर बोलते है वही नाम आप मुझे बोलने के लिए बोले थे

तो स्वामी जी बोलते है के मैं कब बोला था Kabir बोलते है के उस दिन जब आप तालाब पर नहाने जा रहे थे तो आपके पाव से मुझे चोट लग गया था तो आप बोले राम नाम बोलो बच्चा

बालक कबीर ने एक अपनी लीला दिखाई

स्वामी जी चौक कर बोलते है वो बच्चा बहुत छोटा था और तुम काफी बड़े दीखते हो तभी बालक कबीर ने एक अपनी लीला दिखाई और वही बालक बन कर स्वामी जी के पाव के पास पड़ कर बोलते है के गुरु जी यही बच्चा था न स्वामी जी कुछ बात समझ जाते है और बोलते है उठ जाओ कबीर ,

और Kabir उठ जाते है अब स्वामी जी कबीर को अपने आश्रम पर रहने आने जाने की अनुमति दे देते है कबीर एक और कला दिखते है स्वामी जी हर दिन रात्रि में ध्यान में बैठते थे उस दिन भी स्वामी जी ध्यान में बैठे तो हर दिन स्वामी जी के ध्यान में ठाकुर जी को देखते थे

और आज ध्यान में बैठे तो ध्यान में कबीर जी को देखे स्वामी जी आंतरिक जानकार थे तो वो सब बात समझ गए फिर उसके बाद से हमेशा स्वामी जी और कबीर में आंतरिक ज्ञान की बातें हमेशा होने लगी

योगी गोरखनाथ का सत्संग के लिए आना

कबीर अपने घर चले गए कुछ दिन के बाद वहाँ योगी गोरखनाथ आते है और बोलते है के मैं आज के सातवे दिन आऊंगा तुम से सत्संग करने अगर तुम हार गए तो मेरी पराधीनता स्वीकार करना पड़ेगा और चले जाते है अब इस बात को लेकर सब चिंतित रहने लगते है उस समय गोरखनाथ का बहुत बोलबाला था

क्यूंकि गोरखनाथ बहुत से आश्रम वालों को पराजित कर चुके थे उनका वास्तविक काम ये था के वो योगसाधना से सिद्धि प्राप्त कीये थे तो वो सत्संग करने के लिए त्रिशूल को जमींन में धसा कर त्रिशूल के नुख पर बैठ जाते और बोलते के मेरे बराबरी में आकर सत्संग करो और कोई कर नहीं पाता

और वो पराजित हो जाता इसी बात से सब चिंतित थे तभी कबीर आश्रम में आते है सबको चिंतित देख चिंता का कारन पूछते है तो उनको ये सारी बात बताई जाती है तब कबीर बोलते है गुरु जी आप चिंता मत कीजिये गोरखनाथ आएंगे तो बोल दीजियेगा के पहले मेरे शिष्य से सत्संग कर लो फिर मुझ से करना स्वामी जी बोले ठीक है

कबीर

गोरखनाथ और कबीर जी का सत्संग

 

अब वो दिन आ गया गोरखनाथ आये और बोले आओ रामानंद सत्संग करो स्वामी जी बोले पहले मेरे शिष्य से सत्संग करो बाद में मुझसे करनातो गोरखनाथ बोले ठीक है गोरखनाथ अपना वही काम किये और त्रिशूल को जमींन में गाड़ कर त्रिशूल के नुख पर बैठ गए

और बोले आ जाओ मेरे बराबरी में और सत्संग करो तो कबीर कुछ ढूंढते है तो उन्हें एक सुतली की गठा दीखता है कबीर उस सुतली को पकड़ कर आसमान के तरफ फेक देते है और वो सुतली आकाश में जा कर रुक जाता है

कबीर उस सुतली को पकड़ कर आसमान में जा कर बैठ जाते है और बोलते है गोरखनाथ आ जाओ और सत्संग करो अब गोरखनाथ काहेको वह रुके वो अपना त्रिशूल उखाड़ कर भाग चले आगे जानेंगे सद्गुरु कबीर साहेब के ईश्वर कौन थे अब आगे की जो भी बात है वो दूसरे भाग में बताऊंगा साहेब बंदगी 

 

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