सदगुरु Kabir Saheb Aarti ,ज्ञान अधार विवेक की बाती, सुरति ज्योत जहाँ जाग। आरती करूं सद्गुरु साहेब की, जहाँ सब सन्त समाज। दरश परस गुरु चरण शरण भयो, टूटि गयो यम के जाल। कबीर गुरु महिमा के बारे में लिख रहा हूँ आशा करता हूँ। आप सभी को पसंद आएगा साहेब बंदगी Kabir Saheb Aarti वंदना … Read more
बावन जंजीरा कसनी जो सद्गुरु कबीर साहेब के ऊपर सिकन्दर के द्वारा कराया गया था। जो 52 प्रकार के यातनाएँ दिए गए थे। सद्गुरु कबीर साहेब ने इन्ही बावन जंजीरा से उन यातनाओं का निवारण किये। उन्ही बावन जंजीरा मंत्र का यहाँ विवरण दिया जा रहा है।
कबीर साहेब के बावन जंजीरा (52 जंजीरा) मंत्र, पारंपरिक पाठ, ध्यान और विधि के बारे में विस्तार से जानें। यह सामग्री उपलब्ध प्राचीन पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत की गई है।
बावन जंजीरा
बावन जंजीरा का परिचय
कबीर साहित्य में बावन जंजीरा अपना एक अलग ही महत्व रखता है। बावन जंजीरा का संबंध बावन कसनी है। दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी के गुरू शेखतकी ने सद्गुरू कबीर साहेब के बढ़ते प्रभाव से चिढ़कर बादशाह से झूठी शिकायतें की। शेखतकी बादशाह के गुरू थे और बादशाह के पास शक्ति थी।
कबीर साहेब और बावन कसनी
अतः अपने प्रभुत्व (गुरूत्व) का अनुचित प्रयोग कर शेखतकी सद्गुरु कबीर साहेब को बहुत प्रकार से प्रताड़ित करने लगे। वे गिनती में बावन बतायी जाती है। सद्गुरू जिन उपायों (मंत्रो) से उन परीक्षा रूपी कसनी (जंजीर) को तोड़ते गये, वे ही बावन जंजीरा के नाम से विख्यात है। जंजीरा अर्थात जंजीर, श्रृंखला, बंधन।
कोई भी कार्य बिना तपश्चर्या, लगन और समर्पण से सिद्ध नहीं होता है। मन में अनन्त शक्तियाँ निहित है। मन की शक्तियों को प्रगट करने के लिए आवश्यक है कि हमारा मन एकाग्र हो। जब मन एकाग्र हो जाय तो जो भी कार्य किया जाता है उसमें शीघ्र सफलता प्राप्त होती है। मन की शक्ति के ह्रास के प्रमुख द्वार है: हमारी पंच ज्ञानेन्द्रियाँ। यदि इन्हें यूं ही अनियंत्रित खुला छोड़ दिया जाय तो मन निर्बल हो जाता है।
मन ताकतवर न होने से लगन और निष्ठा कमजोर हो जाती है जिससे किसी भी कार्य में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती। जैसे बाढ़ के द्वारा लाई गई मिट्टी को हटाने के लिए पानी का प्रेसर काम में लाया जाता है। इसके लिए पाइप का मुँह संकरा रखा जाता है ताकि पानी वेग के साथ निकले। किन्तु यदि पाइप में जगह-जगह छिद्र हों तो वेग कमजोर होगा। ऐसे ही सूर्य की बिखरी किरणों को जब विशेष काँच के द्वारा एक बिन्दू से पार करायी जाती है तो केन्द्रित किरणों के तेज से नीचे रखा गया कागज जल जाता है।
इसी प्रकार मन के अन्य रास्ते बंद करके उसे किसी एक कार्य में केन्द्रित किया जाये तो कार्य में शीघ्र सफलता मिलती है। यही साधना का मतलब है। साधना का अर्थ है मन को शक्तिशाली बनाकर उनकी सुप्त शक्तियों को जागृत करना।
बावन जंजीरा के मंत्रो को नियम और विधिपूर्वक सिद्ध किया जाय तो उसका बड़ा लाभ देखने को मिला है। सद्गुरू ने इन मंत्रो से बावन कसनी रूप जंजीरा को तोड़ा था। ये मंत्र आज भी उतने ही प्रभावशाली हैं, बशर्ते साधक किसी समर्थ गुरू के मार्गदर्शन में तथा शुद्धआचरण, पवित्र मन और निष्ठापूर्वक साधना करें। परहित की भावना से यदि सिद्ध किये मंत्रों को व्यहृत किया जाये तो निःसन्देह फलित होता है।
आचार्यपीठ खरसिया के पूर्व आचार्य श्री हजूर उदितनाम साहेब समर्थ और सिद्धपुरूष थे। उनके आर्शीवाद प्राप्त बहुत से भक्त उन्हें एक सिद्ध महापुरूष के रूप में स्मरण करते हैं। दिल्ली, राजस्थान, बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में बहुत से ऐसे भक्त हैं, जिनके जीवन में उनका आर्शीवचन फलित हुआ। उनकी लहरतारा स्मारक (वाराणसी) स्थित समाधि सिद्ध भूमि है।
बहुत से भक्त एवं साधु समाधि स्थल में जप-तप-ध्यान करके सिद्धि प्राप्त किये हैं। उनकी पुण्यतिथि पौष शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर यह ‘बावन जंजीरा’ पुस्तक प्रकाशित की जा रही है। इस कार्य में उनसे उनके आर्शीवाद की कामना करते हैं।
सत्सुकृत आदि अदली अजर अमर अचिंत पुरुष मुनीन्द्र करुणामय कबीर सुरतियोग संतायन चार गुरु धनी धर्मदास वंश बयालिस की दया
इन शुभ मासों में से कोई मास हो उस मास में जब पूर्णिमा या चतुर्दशी
सोमवार, बुधवार, गुरुवार अथवा शुक्रवार की हो सिद्ध करें।
यह सद्गुरु का पाठ या व्रत पूर्णिमा ही को होता है।
परन्तु पूर्णिमा जब ३० दण्ड से कम रहे तब चतुर्दशी को ही शुरु करें।
सिद्ध इस प्रकार करें कि पूर्णिमा या चतुर्दशी जिस दिन उपरोक्त
शुभ दिनों में से कोई दिन हो उस दिन व्रत करे, फलाहार करें।
जाप का स्थान एकान्त हो किसी प्रकार हल्ला-गुल्ला न हो।
जिस स्थान में पाठ करने के लिए निश्चित किये हों, उस स्थान को
श्वेत मिट्टी तथा नये वस्त्र से लीप कर पवित्र करें। चन्दन और इत्र छिड़क दें, श्वेत सुगन्धित फूलों में जैसे- चम्पा, चमेली, बेली, मोगरा इत्यादि जो प्राप्त हो सकें. लावें ।
तीन घंटा या सवा पहर रात्रि व्यतीत होने पर जाप आरम्भ करें।
जाप इस प्रकार करें, जहाँ जाप करने का स्थान निश्चित किये हों उपरोक्त
विधि से लीप-पोत कर पवित्र किये हुए स्थान में चावलों के आटा से चौका पूरें,
कलशा में शुद्ध जल भरकर उसमें पैसा, कसेली डाल दें तब कलशा के मुँह पर
आम के पाँच पत्तें धरें, और उसपर गौ घृत से दीपक जलायें अर्थात् कबीरपंथी महन्त साहब जिस प्रकार से चौका आरती के समय चौका पूरते हैं उसी प्रकार चौका पूर कर कलश आदि रखकर यह कार्य सम्पन्न करें।
प्रसाद के वास्ते-पान, पेड़ा, केला, शक्कर, छुहारा, नारियल, सुपारी, बादाम, लोंग, इलायची इत्यादि सवा पवा भोग मे रखें और धूप के लिये देवदारु, श्वेतचन्दन, कपूर, घी में मिलाकर आम की लकड़ी की अग्नि पर हुमाध देवें (धूप देवें)। तुलसी या श्वेत चन्दन
कबीर जंजीरा बावन कसनी की माला से जाप करें। श्वेत वस्त्र का आसन रखें, पूरब या उत्तर मुख होकर जाप करें। नित्य १०८ बार जाप करें, जाप करने से पहले सद्गुरु का ध्यान कर लें, ध्यान इस श्लोक को पढ़कर करें-
जो कोई आवे मारे करन्ता तेली के लटा परन्ता कलाल के भट्ठी परन्ता सार देश के आदमी प्रदेश परदेश का आदमी सार देश कबीर दाना केता खाय सवा सेर तो खाय अस्सी कोस चलावे बन्द बाँध बार सोलह कला को बाँध छप्पन सो वीर बाँध आठ कोट भैरों बाँध संखनी बाँध डाकिनी बाँध लाव लुता बाँध देव बाँध भूत बाँध चोर बाँध चोरट बाँध दीठ बाँध मूठ बाँध टोना बाँध नीन बाँध तप-तिजारी बाँध एतना सुनके न बाँध तो तेरी माँ के दूध हराम तीसरा रोज ही न गुरु कबीर शिर पर खड़े तब सब सन्तन के सरदार अजर नाम के रक्षा अजर पुरुष
अस्थिर मते चलु कबीर के निर्मल भया शरीर सत्तपुरुष की चौकी सत सुकृत है साथ सत्कबीर अजर शब्द है मैटो सकल विषाद वज्र जंजीरा मरही का सत सुकृत जंजीरा वज जंजीरा दक्षिण देवी नो बहिन को बाँध घाट बाट मरी मसान को बाँध ब्रह्मा विष्णु महेश को बाँध ई अकार बाँध भैरो वीर बजरंग को बाँध अग्नि मुख आवें तो अग्नि को बाँध जल मुख आवे तो जल को बाँध पवन मुख आवे तो पवन को बाँध पृथ्वी मुख आवे तो पृथ्वी को बाँध पाँच तत्त्व पंचभूत आत्मा को बाँध सुरति निरती को बाँध इतना वज्र जंजीरा सुन के जो न आन करे तो सतसुकृत की दोहाई ।
विधि
इस विधि जंजीरा से तीन बार पढ़कर धूली उड़ा दें तो गाँव-ठाँव सब बंध जाय मार्ग में चलते चोर डाकू सर्प आदि सब बन्ध जावे ।
वज्र जंजीरा वज्र के धार । साधु संत के हैं रखवार ।।
जहँ लग शब्द चले चौधारा। बाँधी घेरी चौखण्ड वारा ।।
बाँधो ठोकर ठाटर वार। बाँधो लोह अग्नि की डार ।।
बाँधो चार चुगुल बँटपारा। बाँधो दूती बोल बाँधो मीर ।।
चुक जो सुने ना श्रवण खोल खूनी का खून बाँधो गुलाम का आब बाँधो छूरी का धार बाँधो मूठ कटार बाँधो जम्बू वर बार बाँधो जम्बू धर धार बाँधो आवती परी बाँधो विष का वीरा बाँधो कमान को तीर बाँधो तुपक की गोली बाँधो कुहकना बान बाँधो आकाश की बिजुली बाँधो अष्टकुली नाग बाँधो वीर अवीर बाँधो अपनी काया को बधनी बाँधो रोग शोक बाँधो दुःख दरिद्र बाँधो
अनेक विषधर बाँधो टोना टामन बाँधो इष्ट भैरो पाँचो पीर बाँधो डायन का मुख बाँधो सामन बहिका बाँधो काली बाँधो देशपति के तेज बाँधो माथा के फन्द बाँधो मैं बाँधो तो बोल सद्गुरु वचन प्रमान गुरु कबीर सिर पर खड़े सब सन्तनके सरदार अजर नाम की रक्षा अजर पुरुष अस्थिर मते चले कबीरके निर्मल भये शरीर सतपुरुष की चौकी सतसुकृत है साथ सत कबीर का अजर शब्द है मेटे सकल विषाद ।
विधि
इस जंजीरा को पानी में ३ बार पढकर भूत पकड़े हुए मनुष्य के मुँह पर छींटा मारे तो भूत भाग जावे।
(3) ।। डायन भूत-प्रेतादि को बाँधने का जंजीरा ।।
बाँधो धरती बाँधो आकाश बाँधा मेर मन्दिर कैलास। बाँधो डायन करे चिकार बाँधो दूत भूत सब किला । अजर नाम मुक्तावे शरीरा येही शब्द से सबको बाँधो सतगुरु सत्त कबीरा।
विधि
यदि किसी मनुष्य को भूत-प्रेत पकड़ा हो या डायन किया हो तो इस जंजीरा से पढ़कर झाड देवे तो आराम हो जावे ।
(4) ।। दूत भूत आदि बाँधने का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
जल बाँधो थल बाँधो पैठ पाताल धर बासुकी नाग बाँधो देवी आदि कुमारी बाँधो लोहे की जहाँ कोठरी रूपे वज्र का पेहान तामें धर बाँधे नही सोधनी भूत-भेत ने करहे का तेरे गुरु की वाचा झूठी मेरे गुरु की वाचा फुरे कहै कबीर निष्फल नहीं जाय सत्त शब्द में रहे समाय सत्त शब्द औ पाँचो बान भाग यमरा दिये पयान रोग राई विषहार टर जाई कंचन अगर शरीर हो जाय सतनाम की परी दोहाई दूतभूत सब बाँध चलाई।
विधि
इस जंजीरा से पढ़कर भूत-प्रेत को बाँध दे तो बंधा रहे, कहीं जाप करे तो उस स्थान पर जल पढ़कर जमीन पर छिड़क दे तो वहाँ तक सर्प आदि कोई जीव आसन के निकट न आ सकेगा।
(5) ।। हथियार तोप बन्दूक आदि बाँधने का जंजीरा ।।
वार बाँधो पार बाँधो बाँधो तुपक ताई तुपक का पलीता बाँधो सत्तनाम की दुहाई अंग बाँधो यम बाँधो धोरे का सवार बाँधो भाला वाले धनुष वाले का हाथ बाँधो सत्नाम की दोहाई लोहे झरे लोहा झरे झर झर परे जंजीर तुपक वान गोला झरे झरे कम न और तीर हाथ खर्ग तृण ना टुटे बत्तीस वान देह नहीं खुटे निज प्रतीति शब्द की आनो सत्तनाम करि हैं रक्षा आकी रंग लोहे की आन झरे बत्तीस खर्ग को धार चौदह यम की हाथ धरो सोहं तार
पुरुष होय रखबार सोहं तार पुरुष रक्षा करें तीर तुपक दूर सब परे हाथ खर्ग गज चक्कर त्रिशूल दीन देवारी सोहं तार पुरुष मोहे लेव उबार सतगुरु केवल कोई ना यमकरि हैं धात यम मारों दूर करों धरो मस्तक पर हाथ उलट आवे पलट जाय काल संघी ताहिं को खाय मारों भूत विडारों काल कलि में जीव करों प्रतिपाल जो कोई करे वोही पर परे पिण्ड प्राण की रक्षा करे साहब बन्दीछोर कबीर ।
विधि
धूरी पर इस जंजीरा को तीन बार पढ़ के फूंक दे तो बन्दूक, भाला, धनुष आदि हथियार बन्ध जावे कुछ भी काम न करे।
(6) ।। यम डायन भूत आदि बाँधने का जंजीरा ।।
बाँधो ब्रह्मा विष्णु मुरारी। जिनके किये सकल संसारी ।।
साहब कबीर रक्षपाल । कहैं कबीर सुनो धर्मदास जंजीरा शब्द करो प्रकाश ।।
विधि
जब किसी को झाड़ने जाँय तब पहले इस जंजीरा को पढ़कर अपनी देह की रक्षा कर लेवें तब मंत्र (मंत्र पढ़ने वाले) पर डाकनी साकनी का गुन चलाया नही लगें प्रेतादि पकड़ा हो तो वह बोलने लगे ।
(8)।। रक्षाबंधन जंजीरा ||
सर काग बीघ बाघ कूकरा मंजार नाग नाहर विषधर घनै कबीर करौं कबीर गुसाई के कबही होय विनाश चाँद जेहैं सूर जैहैं धरनी आकाश सोई वचन कहैं कबीर ने सोई वचन प्रमाण ।
विधि
यदि कहीं बीहड़ या खौफ खतरनाक जगह पर रहने का मौका पड़ जाय तब इस जंजीरा को पढ़कर अपने चारों तरफ घेरा दे दें या पढ़कर जल छिड़क दें तो सर्प-बिच्छू, बाघ, सिंह आदि कोई भी घात न करे या कहीं विकट रास्ता जाने का मौका हो तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो हिंसक पशुओं और सर्प-बिच्छुओं से निर्भय रहे।
(9) ।। भूत भगाने का जंजीरा ।।
जल बाँधों जलाहल बाँधों दुर्गा आदि कुमारी पैठ पताल वासुकि के बाँधों औ बाँधों हनुमान बली लोहेकार वज्जर किवार भूत भागे शब्द की झार जहाँ मेरी दृष्टि परे और सिद्धि के वाचा टरे जाते • सतगुरु रक्षपाल रखवारी ।
विधि
जिसको भूत छूआ हो उसे इस जंजीरा से जल पढ़कर मुँह पर छींटा मारें या वही पानी पिला दें तो भूत भाग जाय ।
(10) ।। दूसरा ।।
कहो जंजीरा मंत्र सुरा बावन लाख अस्थूल शब्द हमारी फिरे संसारा धर्म राय भाखीकर डारा भागो धर्म गयो पताला भागों रावन भागे डायन भागे चुरेलिन देई चिकार मटाया मसान सब भागे नातो शब्द हमारो मान जार बार भस्म कर डारो पर माया अष्टमी भवानी सकत निरंजन निराकर सतपुरुष की आन अजर नाम की फिरि दोहाई दूत भूत सब चले पराई।
विधि
इस जंजीरा से पानी पढ़कर मुँह पर छींटा मारें तो प्रेत चिक्कार मार कर भाग जावे और शेष पानी पिला देवे।
(11) ।। तीसरा ।।
मारों डंडा मारों खण्डा मारों भूत करों नौ खंडा मारों भूत भूत के राजा मारों भूत बजाऊँ बाजा कबीर के हाथ सार की कबीर ठाढ़े काट के छाती आन कुँआँ के पानी आको काटो धरो हाँक परी धर्मदास के निर्मल भये शरीर जापर दया करें कबीर
विधि
कुआँ से एक हाथ से पानी भरकर लावे और उस जल पर इस जंजीरा को तीन बार पढ़ कर रोगी को पिलायें तो भूत तुरंत भाग जाय।
(12) ।। मार्ग रक्षक जंजीरा ।।
घाट बाट औघट बनाऊँ मोंहि धनी के आस मत्थे चले कबीरके भूखन मरुं पियासा बाँधो नाहर नाहरा कूकरा मंजार बाटमों कबीर जंजीरा बावन कसनी सतगुरु कबीर बाँध डार राह करों मैदान चोर न भेटे बाघ न खाय रौंधा सर्प लगे नहिं धाय पाँव तले नाग परे पर हर जाय सत्त कबीर की फिरी दोहाई बावन लाख दगा मिट जाई सत सुकृत कहो मन लाय अग्नि पवन शीतल हो जाय।
विधि
रास्ता चलते चलते सांझ हो जाय और रास्ता में अंधेरा के कारण सर्पभय, बाघभय, चोर प्रेतादि का भय हो तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो सब जीव रास्ता छोड़ कर हट जायेंगे कोई जीव घात नही करेगा, सर्प-बिच्छू भी डंक मार न सकेगा।
(13) ।। दूसरा ।।
कागे कागरो विकार कूकरा मंजार नाग नाहर दूत भूत बट पार सब कहँ बाँधे कबीर गोसाई आन घाट ले डार घाट बाट बन औघटे मोंहि खसम की आस मत्थे चले कबीर के कबहुं होय विनाश।
विधि
रास्ते में यह जंजीरा पढ़ता जाय तो किसी जीव जंतु का भय न हो, कुत्ता, बिलाय बाघ दूत भूत आदि किसी का भय न हो।
(14) ।। तीसरा ।।
बाघ बीघ औकूकरा मंजार नर नाहर विषयादिक मुआ भूतक मसान मलेच्छ बाँधो कबीर गुसाई अंध कूप मे डार घाट बाट बन औघटे मोंहि खसम की आस मत्थे चले कबीर के कबहुं न होय विनाश हाटरी से हाटरी टोट कारी आये अर्मी कुल बलाय टारी मीरा शाह आद अहमद सुल्तान कबीर सत्तर से कुल्लावे की जंजीर कस कस मारे मीरा शाह अहमद सुल्तान कबीर ।
विधि
बन या भयानक रास्ते मे यदि कुबेला हो जाय तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो बाघ, कुत्ता, बिलार, भूत आदि किसी का भय न हो और न कोई घात करे।
(15) ।। मृगी का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
अजर नाम सबते निज सारा। यह शब्द से जीव उबारा।।
कर्म भर्म भया सबं दूर। सतगुरु शब्द रहा भर पूर । ।
मृतुक रोग मृगी का होई। अजर नाम सो दीन्हा खोई ।।
यह निज शब्द जपे जो साध। मिट गई मृगी रोग असाध ।।
कहैं कबीर प्रतीत हमार । येहि शब्द सो जीव ज्वार ।।
विधि
जिस मनुष्य को मृगी आवे वह मनुष्य इस जंजीरा को प्रातः काल स्नान करके २१ बार पढ़े तो मृगी रोग छूट जाय ।
(16) ।। अधकपारी के दर्द झारने का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
कारी छेरी लभथनी हरिहर थोथा खाया हाँक परे कबीर गुसाई वे आधा शीशी जाय ।
विधि
इस जंजीरा को पढ़ता जाय और ललाट को अंगुली से पकड़ कर दबाते हुये अंगुली चलाया जाय, पाँच बार जंजीरा को पढ़कर झारे तो आधे माथे का दर्द आराम हो जाय।
(17) ।। डाढ़ के दर्द व कीड़ा झारने का जंजीरा।। बावन जंजीरा
अरे अरे ग्वानि तु बन जारिन पहर पर्वत से उतरे ग्वालिन फलाने के डाढ़ के कीड़ा मारों जन्म जन्म के कीड़ा टारों ऊँ नमो आदेश गुरु को
विधि
(डाढ़ चौड़े दाँत को कहते हैं) यदि डाढ़ मे दर्द हो या कीड़ा पड़ जाय तो इस जंजीरा से झार दें तो दर्द और कीड़ा आराम हो जाय।
(18) ।। कुत्ता का विष झारने का जंजीरा।।
सप्त खण्ड विकट घाट धार बाँधों सात पके न फूटे पीरा न करे वाचा कबीर गुसाई के फूरे।
विधि
राख पर २१ बार इस जंजीरा को पढ़ के कुत्ता जहाँ काटा हो लगा दें तो आराम हो जाय। और गुड़ पर पढ़ कर दे दें और रोगी को थोड़ा-थोड़ा सात दिनों तक खाने को कहे।
(19) ।। दूसरा जंजीरा ,कुत्ता का विष झारने का जंजीरा।।
कागरो कूकरो उन्दुरो मंजार नर नाहर चोरी करे लंका के उजियार लंकार अस कोट समुद्र ऐसा खाई उतरे विष सत सुकृत दोहाई कबीर इसको खाय ना मरे तो निर्विष हो जाय दोहाई सत्त कबीर गुरु की।
विधि
धुअन और पीपल के पत्ता से झारे, डल्ली धुअन को महीन
पीस कर बुकनी बना ले, सात पत्ता पीपल का लेकर सातों से झारे, हंसुआ को गोइठा (उपलों) के आग में तपावे जब लाल हो जाय तब पत्ता पर थोड़ा थोड़ा धुअन लेकर जहाँ कुत्ता का दाँत गड़ा हो उसी जगह जरा ऊपर अर्थात जखम के ऊपर पीपल के पत्ता पर धुअन को तपाये हँसुआ से घुमावे और जंजीरा (मंत्र) पढ़ता जाय। सात बार एक पत्ता पर पढ़ कर झारें इसी प्रकार सातो पत्तों पर पढ़-पढ़ के झारे तो कुत्ता का विष उत्तर जावे, जखम न होवे।
महत्वपूर्ण सूचना: यह लेख धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं तथा उपलब्ध प्राचीन ग्रंथ/पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इसे चिकित्सा, कानूनी या वैज्ञानिक सलाह के रूप में न लें। किसी बीमारी, विषैले जीव के काटने या आपातकालीन स्थिति में तुरंत योग्य चिकित्सक अथवा आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न. बावन जंजीरा क्या है?
उत्तर: बावन जंजीरा कबीर पंथ की परंपरा से संबंधित 52 जंजीरों और मंत्रों का संग्रह माना जाता है। इस लेख में बावन जंजीरा का परिचय, पारंपरिक पाठ, ध्यान और संबंधित विधि प्रस्तुत की गई है।
प्रश्न. बावन जंजीरा और 52 जंजीरा क्या एक ही हैं?
उत्तर: हाँ, बावन का अर्थ 52 होता है। इसलिए बावन जंजीरा को सामान्य रूप से 52 जंजीरा भी कहा जाता है।
प्रश्न. कबीर जंजीरा मंत्र क्या है?
उत्तर: कबीर जंजीरा मंत्र से आशय कबीर पंथ की परंपरा में वर्णित जंजीरा मंत्रों से है। इस लेख में उपलब्ध पारंपरिक पाठ और उससे संबंधित जानकारी प्रस्तुत की गई है।
प्रश्न. बावन जंजीरा का पाठ किस स्रोत पर आधारित है?
उत्तर: इस लेख में प्रस्तुत बावन जंजीरा का पाठ कबीर साहेब आश्रम से संबंधित एक पुरानी पुस्तक के आधार पर संकलित किया गया है। पाठ को पारंपरिक स्रोत के अनुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
प्रश्न. बावन जंजीरा में कितने जंजीरा होते हैं?
उत्तर: बावन जंजीरा नाम के अनुसार इसमें 52 जंजीरों का उल्लेख किया जाता है। लेख में सभी 52 जंजीरा मंत्रों को क्रमवार प्रस्तुत किया गया है।
प्रश्न. Kabir Janjira Mantra क्या है?
उत्तर: Kabir Janjira Mantra, कबीर जंजीरा मंत्र को Roman Hindi या English में खोजने का एक प्रचलित तरीका है। इस लेख में बावन जंजीरा, 52 जंजीरा और Kabir Janjira Mantra से संबंधित जानकारी उपलब्ध है।
आज हम इस ब्लॉग में , Kabir Das Ka Bhajan, एक बहुत ही सुंदर भजन प्रस्तुत कर रहे है , आशा करता हूँ के आप सभी को पसंद आएगा (हिंदी) (English). Kabir Das Ka Bhajan यह सूंदर तन मिला भाग से यह सूंदर तन मिला भाग से करलो अपना काम भजो सतनाम, भजो सतनाम, … Read more
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इस Kabir Satsang में बताई गई हैं की इस संसार सृष्टि में चौरासी लाख जीव-योनियां हैं। उनमें सबसे उत्तम मनुष्य योनि को माना जाता है।क्योंकि सभी योनियों के जीव केवल खाने- भोगने एवं सोने तक सीमित हैं। वे अपने शरीर के अतिरिक्त ज्ञान-ध्यान, आत्मा- परमात्मा की बात नहीं समझते, अतएव उनके कल्याण का भी कोई अर्थ … Read more
<ज्ञान गुदड़ी संध्या पाठ> Sandhya Path लिगन कठिन मेरे भाई, गुरु से लगन कठिन मेरे भाई। लगन लगे बिनु काज न सरिहैं, जिव परलयतर जाई ।। मिरगा नाद शब्द का भेदी, शब्द सुनन को जाई। सोई शब्द सुनि प्राण देत हैं, तनिको न मन में डराई ।। .. तजि धन धाम सती होय … Read more
Kabir Das Ji ka Jivan Parichay के बारे में बात किया जाय तो कबीर दास जी इस धरातल पर स्वयम प्रगट हुए थे। निरु नाम का जुलाहा कशी में रहता था , निरु का शादी नीमा से हुआ था। एक समय निरु अपनी पत्नी नीमा का गौना कराकर ले कर आ रहा था ,वो समय ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष एवं बरसाइत पूर्णिमा तिथि थी।
Kabir Das ka Jivan Parichay बिसतार से
नारि लिवाय आय मग माहि। जल अचवन गई बनिता ताही।।
ताल माहि पुरइन पनवारा। शिशु होए मैं तहं पगु धारा।।
तहां जस बालकै रहुँ पौडाई। करौं कुतुहल बाल स्वाभाई।।
निरु अपनी पत्नी नीमा को लिवाकर मार्ग में आ रहा था , तो ऐसा हुआ की नीमा को प्यास लगी ,उनके मार्ग के समीप काशी लहरतारा तालाब था। नीमा पानी पिने की इच्छा से तालाब के समीप गयी , उन्होंने तालाब के जल से अपनी प्यास बुझाई और जैसे ही वो तालाब से बाहर निकलने को मुड़ी तभी उनका ध्यान एक नौजात शिशु पर पड़ी जो तालाब में कुछ दूर पर कमल के पुष्प पर कौतुहल कर रहा था।
नीमा उस बच्चे के पास गयी वो बच्चा इतना सूंदर था और उसके चेहरे पर अद्भुत चमक थी , नीमा ने उस बच्चे को अपनी गोद में उठा ली और इधर – उधर देखने लगी के ये किसका बच्चा है लेकिन वहां कोई और नहीं दिखा। फिर काफी देर हो गयी तो निरु राह देख – देख कर तालाब पर पहुंचे, नीमा के गोद में बच्चा देख निरु चौक कर पूछे ये बच्चा कहाँ से लायी।
नीमा ने सारी बात निरु को बता दी, निरु कुछ देर सोच कर बोले के इस बच्चे को जहाँ से उठायीं हो उसी स्थान पर वापस रख आओ, नीमा बोली ऐसा क्यों बोल रहे हो, निरु ने कहाँ अभी तुम्हे गवना करा कर ला रहा हूँ गोद में बच्चा देख कर लोग क्या क्या नहीं बोलेंगे इन बातों पर दोनों दम्पति में नोकझोक चल रहा था। तभी उस बचे ने बोला मै अगले जन्म के किसी उद्देश्य से तुम्हारे पास आया हूँ मुझे अपने साथ ले चलो। इसके पश्चात निरु नीमा उस बालक को अपने घर ले आये।
Kabir Das Jivan Parichay कबीर दास जीवन परिचय
सद्गुरु कबीर साहेब ने परम संतरूप में प्रकट होकर अपनी सहज-सरल एवं गहन-गम्भीर वाणियों के द्वारा जो सदाचार, सत्यज्ञान तथा मोक्ष का सदुपदेश किया, उससे निस्संदेह मानवता को असीम सुख एवं अपार बल मिला और सत्यधर्म की जाग्रति तथा वृद्धि हुई। व्यवहार और परमार्थ के सब रहस्य एवं अंगों से पूर्ण उनकी उत्कृष्ट सदाबहार शब्द-साखियां लोकप्रसिद्ध हैं। उनके शब्द-शब्द में अत्यंत गूढ़ भाव एवं गम्भीर ज्ञान सन्निहित है। उनसे उनकी सहजता, सरलता तथा यथार्थता का स्पष्ट बोध होता है। अपने सहज स्वाभाविक सद्गुणों, निष्पक्ष ज्ञान- विचारों एवं सर्वकल्याणकारी शब्द- उपदेशों से वे जन-जन के प्रिय तथा परम वन्दनीय हैं।
जैसे आकाश में असंख्य टिमटिमाते तारों के बीच में एक चन्द्रमा चमकता हुआ शोभित होता है और उसकी श्वेत चांदनी से रात्रि भी शोभा पाती है, वैसे अनेक संत-महापुरुषों के नामों में एक नाम ‘कबीर’ अद्वितीय ढंग से चमकता- शोभता है और उसकी दिव्य चमक से समूचे संत-क्षेत्र की महिमा बढ़ती है। वस्तुतः ‘कबीर’ नाम है-उस सत्यता, पवित्रता एवं निष्कामता का जिसकी संगति में आने वाला हर कोई जिज्ञासु ‘साधु’ हो जाता है।
सद्गुरु कबीर साहेब का उपदेशित ज्ञान ऐसा चमत्कारी है कि जो उसे ठीक से ग्रहण करता है, वह उसके घट के पट खोलकर उसे नया मुक्त एवं श्रेष्ठ जीवन प्रदान करता है। प्रायः देखा जाता है कि जीवन-सुधार या कल्याण के लिए ज्ञान- सदाचार की बात हो या आत्मा-परमात्मा की चर्चा, भजन-कीर्तन हो या सत्संग-
प्रवचन, वहां पर कबीर साहेब के नाम के साथ उनके अनमोल वाणी-वचनों का उदाहरण आ ही जाता है। कई बार बड़े जन-समूह एवं धर्म-सम्प्रदायों में मन की शंकाओं का समाधान तथा सत्य का प्रतिपादन करने के लिए भी उनकी सारगर्भित वाणी का आधार लिया जाता है। सचमुच, बात चाहे व्यवहार की हो या परमार्थ की, सर्वथा सत्य पर आधारित कबीर साहेब की बात अकाट्य एवं निराली है, जो सभी के विश्वास को पुष्ट करती है और उसे मानने को बाध्य भी।
सद्गुरु कबीर साहेब के असंख्य साखी शब्दों में समाया हुआ उनका सत्यज्ञानोपदेश अटके-भटके सांसारिक जनों को धर्म एवं कर्तव्य का सही मार्ग दर्शाता है। वह उन्हें निम्न पशुता से उठाकर समुन्नत श्रेष्ठ मानव-जीवन जीने की कला सिखाता है। सम्पूर्ण मानवता को उन्होंने अपने शब्दों में समेटा है। सर्व समानता एवं सर्वहित के सच्चे मानव-धर्म को उन्होंने सविस्तार अपने सरल शब्दों में वर्णित किया है। सही अर्थों में सद्गुरु कबीर साहेब मानवता के परम आदर्श और उनकी समस्त शब्द-वाणियां मानव-कल्याण के दिव्य सूत्र हैं। स्वयं सदा सत्य में प्रतिष्ठित और निर्भय सत्य का उद्घोषक, ऐसा उन जैसी निष्काम-निर्मल छवि वाला पूर्ण संत-सद्गुरु अन्य कोई होगा, कहना कठिन है।
ऐसे अप्रतिम प्रतिभावान, अनंत महिमावान सद्गुरु कबीर साहेब के जीवन-चरित्र के बारे में जानने की प्रबल उत्कंठा संत भक्तों एवं जन-साधारण के अन्तर्मन में जाग्रत होना स्वाभाविक है। इस जानने में बड़ी कठिनाई यह है कि उनके बारे में बहुत लोगों ने विभिन्न प्रकार से कहा है और स्वयं उन्होंने अपने शरीर-सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा। प्रायः संत-महापुरुषों ने अपने सांसारिक जीवन-परिचय के बारे में कुछ कहने-लिखने की आवश्यकता नहीं समझी।
उन्होंने तो केवल निस्वार्थ रूप से सर्वजन हित के शुभ कार्य किए और सर्व-कल्याण की ही बातों को कहा-लिखा। हां, यह बात अलग है कि उनके बारे में उन्हीं के समय के लोगों ने जैसा देखा-सुना या समझा, वैसा कहा-लिखा हो। सद्गुरु कबीर साहेब के बारे में अधिकतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके संत भक्तों का कहा-लिखा हुआ और साहित्यकारों का अपने ढंग का समझा-लिखा मिलता है। स्वयं सद्गुरु कबीर की मूल वाणी में यदि उनके परिचय जैसा कुछ मिलता भी है तो उसका भी गहन आध्यात्मिक अर्थ ही अधिक सिद्ध होता है।
यथा-
हिन्दू कहूं तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पांच तत्व का पूतला, गैबी खेलै माहिं ॥
हिन्दू तुरुक के बीच में, मेरा नाम कबीर ।
जिव मुक्तावन कारनै, अविगति धरा शरीर ॥
हम वासी वा देश के, जाति वर्ण कुल नाहिं ।
शब्द मिलावा है रहा, देह मिलावा नाहिं ॥
कबीर का घर शिखर पर, जहां सिलहली गैल ।
पांव न टिकै पपील का, तहां खलकन लादै बैल॥
उपर्युक्त साखियों के भावार्थ से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सद्गुरु कबीर साहेब शरीर एवं शरीर के सम्बन्धों से ऊपर उठे हुए आत्मस्वरूपस्थ थे।
Kabir Das Ji ka Jivan Parichay;
इस संसार को वे अपना देश नहीं मानते थे, अतः इससे उनका कोई लगाव नहीं था। वे अपने-आपको न हिन्दू कहते थे और न मुसलमानादि। पांच तत्व के पुतले शरीर में जो गुप्त आत्मस्वरूप खेलता है, उसी की ओर वे अपने होने का संकेत करते । उस समय के दो बड़े वर्ग हिन्दू और मुसलमान थे, इसलिए उन्हीं को देखते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू-मुस्लिम के बीच में मेरे प्रकट स्वरूप का नाम ‘कबीर’ है।
जीवों को मुक्ताने के लिए ही अविगत पुरुष ने यह शरीर धारण किया है। आगे उन्होंने बताया है कि हम तो उस अलौकिक देश के निवासी हैं, जहां जाति, वर्ण, कुल नहीं होते और जिसका मिलाप शरीर से नहीं, वरन् सार शब्द से होता है। माया-मोह एवं विषय-वासनाओं के धरातल पर वे नहीं थे।
उनका निज घर (निवास-स्थिति) परमात्मस्वरूप-शिखर पर था, जिसके रपटीले मार्ग में चींटी के भी पांव नहीं टिकते। परन्तु वहां संसार के लोग बैल लादकर ले जाना चाहते हैं। कुल मिलाकर सद्गुरु कबीर साहेब अध्यात्म के चरमोत्कर्ष पर थे, जहां
सामान्य दृष्टि से उन्हें नहीं देखा जा सकता। उनका यथार्थ परिचय तो उनकी शब्द- वाणियों में आपूरित उनका सत्यज्ञान ही है। उसके आधार पर उनके देदीप्यमान परम संत जीवन को, उनकी महानता एवं विशिष्टता को किसी हद तक समझा जा सकता है।
परन्तु लोग उनकी शब्द-वाणियों का भी अपने-अपने अनुसार अर्थ लगाते हैं और कुछ दूसरों का अयुक्त-असंगत कहा हुआ बिना विचारे मान लेते हैं। ऐसे ही कुछ कारणों से उनके जीवन चरित्र के बारे में संत-विद्वानों के विभिन्न मत हैं।
किसी ने उनको प्रकृति के अविच्छिन्न एवं अटल नियमों के अन्तर्गत शरीर से सामान्य तो किसी ने सर्व बंधनों से मुक्त असामान्य दिव्य स्वरूप में माना है।
परन्तु प्रायः सभी ने उनके ठोस आध्यात्मिक ज्ञान-विचार एवं सत्य सिद्धान्त के आगे शीश झुकाते हुए उन्हें युग का महान सत्पुरुष तथा सत्यज्ञान प्रदाता परम संत- सद्गुरु स्वीकार किया है।
वह युग घोर विषमताओं, संकीर्णताओं एवं कुनीतियों के अंधकार से युक्त था, जिसमें सद्गुरु कबीर साहेब महान प्रकाशस्वरूप होकर चमके। सम्भवतः उस युगांधकार को चीरने और आगे तक के जन-समाज को जगाने के लिए ही उनका प्राकट्य हुआ था।
समझना चाहिए कि सद्गुरु कबीर साहेब जैसे समुज्ज्वल परमात्म-स्थिति के संत-महापुरुष सामान्य जीवों की भांति सांसारिक भोगों को भोगने के लिए जन्म नहीं लेते। निश्चित ही विधि-विधान से उनके जन्म अथवा
प्राकट्य का कोई विशेष प्रयोजन होता है। मुख्यतः वे लोकोपकार, परहित एवं परमार्थ के लिए ही प्रकट होते हैं। सुप्रसिद्ध संत-महात्माओं एवं असंख्य भक्तों की मान्यता है और प्रसिद्ध कबीरपंथी ग्रंथों में यह वर्णित है कि सद्गुरु कबीर साहेब का प्राकट्य सत्यज्ञान द्वारा जीवों को चेताने, उनका उद्धार करने और इस लोक में सत्य धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए हुआ।
सद्गुरु कबीर साहेब का प्राकट्य भारतीय इतिहास के मध्य युग में हुआ। उस समय भारत में मुसलमानों का राज्य था। उनके इस्लाम का ही सर्वाधिक बोलबाला था। कट्टरपंथी मुसलमान अपने मजहब को फैलाने तथा उसे मनवाने के लिए अन्य मतावलम्बियों पर मनमाना अत्याचार करते थे।
अन्याय-पाप का खुला विस्तार हो रहा था। असत्य का चलन- प्रदर्शन था और सत्य जैसे कहीं लुप्त हो गया था। सब ओर धर्म एवं सम्प्रदाय की विद्वेषाग्नि भड़क रही थी। धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े होते रहते थे और उनका बड़ा रूप होने पर मानव का रक्त बहाया जाता था।
परस्पर वैमनस्य बढ़ रहा था तथा जनमानस में अशांति छाई थी। प्रपंच- पाखण्ड एवं आडम्बर जोरों पर थे। धर्म के ठेकेदार पंडित-मौलवी जनसाधारण को बहकाते हुए अपनी स्वार्थपूर्ति में लगे हुए थे। अंधविश्वासों एवं रूड़ कुरीतियों की जड़ता-दासता से जन-जन दिशाहीन हो चला था।
छूत-अछूत एवं ऊंच-नीच के भेद-भावों से मानव-समाज छिन्न-भिन्न हो रहा था। रात-दिन दुर्बल दीन-होन जनों का शोषण होने से उनका जीना कठिन हो रहा था। परन्तु इस सबके विरुद्ध कोई समर्थ व्यक्ति स्पष्ट कहने वाला न था। मानवता त्रस्त एवं पीड़ित थी।
ऐसी विषमतापूर्ण, विकराल दुख-स्थिति में भक्त सज्जनों, दीन जनता तथा इस धरती की समग्र मानवता का निज रक्षा के लिए अपने इष्ट (त्राता) को पुकारना, प्रार्थना करना स्वाभाविक था। उस कठिन काल में समाज एवं धर्म की दुर्दशा देखकर तथा मानवता की पीड़ा समझकर मानो सबके स्वामी सत्पुरुष- परमात्मा पिघल गए।
उन्होंने उन सबकी पुकार प्रार्थना सुन ली। जिसके परिणामस्वरूप उस क्रूर काल को प्रताड़ने, असत्य को रौंदने एवं सत्य को सामने लाने वाले ज्ञान मोक्ष प्रदाता सद्गुरु-सत्यपुरुष (कबीर) के प्राकट्य का यह शुभावसर आया, जिसकी बहुत पहले से प्रतीक्षा की जा रही थी। कहा गया है-
Kabir Das ka Jivan Parichay;
सतगुरु कबीर प्रकट हुए
चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार इक ठाठ ठये । ज्येष्ठ सुदी बरसावत को, पूरणमासी प्रगट भये ॥
Kabir Das Jivan Parichay;
सद्गुरु के प्राकट्य के बारे में जो कबीरपंथ के विद्वत संत-महंतों ने खोज- शोध कर लिखा या कहा है, श्री गरीबदास जी आदि सुप्रसिद्ध संतों ने जो अपने शब्दों में गाया है और बहुसंख्यक भक्तों की जो मान्यता है तथा कबीर मन्सूर आदि ग्रंथों में स्पष्ट वर्णित है, वह इस प्रकार है-
विक्रमी संवत् चौदह सौ पचपन, ज्येष्ठ मास पूर्णिमा, दिन सोमवार को आकाश-मंडल से सत्यपुरुष का दिव्य तेज काशी (उ. प्र.) के लहरतारा तालाब में उतरा। उस समय अंधेरा छाया हुआ था और मन्द वृष्टि हो रही थी। उस तेज से वह तालाब ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगा तथा सब दिशाएं जगमगाहट से पूर्ण हो गईं।
इस अद्भुत दृश्य को वहां पर बैठे श्री अष्टानन्द स्वामी ने देखा। तत्पश्चात उन्होंने उसका समस्त विवरण स्वामी रामानन्द जी को जाकर सुनाया। उधर फिर वह दिव्य तेज मनुष्य के शिशु-रूप में परिवर्तित हो गया और जल के ऊपर खिले कमल-पुष्प पर हाथ-पांव फेंकते हुए किलकारी मारने लगा। यह प्रत्यक्ष बाल- रूप कबीर था। उनके दिव्य प्राकट्य से सम्बद्ध ये पंक्तियां प्रसिद्ध हैं-
गगन मंडल से उतरे, सद्गुरु सत्य कबीर ।
जलज माहिं पोढ़न कियो, दोउ दीन के पीर ॥
इसे सुयोग ही समझिए कि उसी समय एक काशी का निवासी नीरू जुलाहा अपनी पत्नी नीमा का गौना कराकर उक्त लहरतारा तालाब के समीप के ही रास्ते से जा रहा था। उसकी पत्नी नीमा को बड़ी प्यास लगी थी, इसलिए वह उस तालाब पर जल पीने गई। जल पीने के बाद उसने वहां इधर-उधर दृष्टि डाली तो खिले हुए कमल पुष्प पर एक अति सुन्दर तेजस्वी शिशु को किलकारी मारते देखा। वह उसके पास चली गई तो हृदय में अत्यंत स्नेह उमड़ पड़ा।
तभी उसने उस शिशु को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। फिर वह उस शिशु को लिए हुए अपने पति नीरू के पास आई और उसे वह प्यारा शिशु दिखाया। उस शिशु के सम्बन्ध में नीरू के पूछने पर उसने उस शिशु के लहरतारा तालाब के कमल पुष्प पर देखे -पाये जाने की अनूठी बात बता दी।
इसके साथ ही नीमा ने अपने दृढ़ निश्चय से कहा कि अब हम इस बालक को अपने पास ही रखेंगे। नीरू के बहुत मना करने तथा समझाने पर भी नीमा ने उस शिशु को अपने से अलग नहीं किया। अन्ततः वे पूरी तरह सोच-विचारकर उसे अपने घर ले आए और खुशी-खुशी उसको पालने-पोसने लगे। उन्होंने जब उस बालक का नामकरण मौलवी एवं पंडित के द्वारा कराया तो उसका नाम ‘कबीर’ रखा गया। वही बालक ‘कबीर’ आगे चलकर जगत में परम संत-सद्गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
दम्पत्ति नीरू-नीमा जुलाहे के यहां बालक कबीर समय के साथ-साथ पलते-बढ़ते गए। उनका तेजोमय स्वरूप बड़ा सुन्दर एवं आकर्षक था। नीरू- नीमा और उनके आस-पास के सब लोगों को रोज-रोज उनकी आश्चर्यपूर्ण बाललीला देखने को मिलती थी। स्वाभाविक रूप से ही बालक कबीर अद्भुत साहसी, तीव्र मेधावी और असाधारण गुणों से भरपूर थे। प्रसिद्ध संत श्री गरीबदास जी अपनी वाणी में कहते हैं कि काशी में कबीर जब पांच वर्ष के हुए, तब वे अद्भुत कला, ज्ञान-ध्यान एवं दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न थे। यथा-
पांच बरस के जब भये, काशी मांझ कबीर। गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुण सीर ॥
इतनी अल्प आयु में बालक रूप कबीर साहेब का इतना महान प्रतिभाशाली होना सबको आश्चर्य में डालता था। उनकी सीधी-सरल सत्य एवं ज्ञान की बातों को सुनकर बड़े-बड़े पंडित-मौलवी ढीले तथा कमजोर पड़ जाते थे। उन्हें उनकी बातों का उत्तर न सूझ पड़ता था। ऐसे ही बहुत लोग उनके ज्ञान-विचारों का लोहा मानते थे। अपनी विशिष्टता से कबीर लोगों के हृदयों में उतरते गए।
संसार में आए सभी लोगों को गुरु की आवश्यकता है, क्योंकि बिना गुरु से ज्ञान पाए सांसारिक माया-मोह, विषय-वासनाओं एवं राग-द्वेषादि से छूटना तथा कल्याण-मोक्ष का पाना सम्भव नहीं है। परन्तु कबीर साहेब सामान्य संसारी लोगों की भांति किसी आसक्ति या बंधन में नहीं पड़े थे।
वे तो स्वतः ही संसार से विरक्त, सत्यज्ञान सम्पन्न एवं सदा जाग्रत मुक्त स्वरूप थे, अतः उन्हें ज्ञान एवं मुक्ति पाने के लिए किसी गुरु की आवश्यकता न थी। फिर भी उन्होंने गुरु-पद का गौरव बढ़ाने और लोक-मर्यादा को निभाने के लिए उस समय के सुप्रसिद्ध विद्वान वैष्णव स्वामी श्री रामानन्द जी को गुरु किया।
यद्यपि स्वामी रामानन्द जी स्वेच्छा से कबीर साहब को अपना शिष्य नहीं बनाना चाहते थे, तथापि कबीर साहेब ने अपने एक अद्भुत प्रकार से स्वयं को सामने लाकर स्वामी रामानन्द के मुख से निकले ‘रामनाम’ को जानकर उन्हें अपना गुरु मान लिया।
रामानंद स्वामी को इस प्रकार गुरु कीऐ;Kabir Das Ji ka Jivan Parichay
स्वामी रामानन्द जी को गुरु-रूप में स्वीकारने पर भी कबीर साहेब उनकी मत मान्यताओं से अलग रहे। कबीर साहेब के अविनाशी राम तथा उनकी निष्काम सहज भक्ति-साधना स्वामी रामानन्द जी के दाशरथि राम, मूर्तिपूजा एवं विभिन्न कर्मकांडों से भिन्न थी। फिर भी कबीर साहेब विनम्र भाव से स्वामी रामानन्द जी को गुरु-रूप में बराबर सम्मान देते थे। समय-समय पर उन्होंने अपनी गम्भीर ज्ञानवार्त्ता और सत्य गुरु-भक्ति का परिचय देकर स्वामी रामानन्द जी को संतुष्ट एवं प्रसन्न किया।
इतने पर भी सद्गुरु कबीर साहेब और स्वामी रामानन्द जी के ज्ञान-सिद्धान्त का अन्तर देखते हुए उनका गुरु-शिष्य मर्यादा में होना कठिन जान पड़ता है। कहीं पर तो कबीर साहेब ही अपनी सारगर्भित निर्णय बात को स्वामी रामानन्द को उपदेशात्मक रूप से कहते हैं और उनके न मानने पर जोर से उलाहना देकर उन्हें समझाते हुए लगते हैं।
रामानन्द रामरस माते। कहहिं कबीर हम कहि कहि थाके ॥
अर्थात् “स्वामी रामानन्द कल्पित राम एवं दाशरथि राम के भाव-रस में मोहे
रहे, मैं उन्हें कह-कहकर थक गया। परन्तु वे हृदय में रमे अविनाशी आत्माराम को नहीं देखते-समझते हैं।” ऐसी स्थिति में यह कैसे माना जाए कि कबीर साहेब
के गुरु रामानन्द थे ? बस यही कहा जा सकता है कि उन्होंने लोक-मर्यादा के लिए ही स्वामी रामानन्द को गुरु किया होगा।
समय के साथ-साथ चलते-बढ़ते हुए सद्गुरु कबीर साहेब अपने निर्मल, समुज्ज्वल ज्ञान-विचारों से सूर्य सदृश्य उजागर हुए। उनके समुन्नत उत्कृष्ट जीवन में धर्म-कर्म सम्बन्धी ऐसी कई अनूठी घटनाएं घटीं जिनसे सब ओर उनका बहुत नाम हुआ और उन्हें यश मिला। घर-संसार से उनका कोई लगाव न था।
न उन्हें किसी से कुछ लेना-देना था। वे अपने-आप में पूर्ण निश्चिंत फक्कड़ मस्त स्वभाव के थे। परहित एवं परमार्थ के पथ पर चलना ही उन्हें अच्छा लगता था। वे अपने-आप के राम में मग्न रहते और लोगों को सत्य-तथ्य से अवगत कराते थे। उन्हें उनकी भूल एवं उनके मोह-अज्ञान को बता-समझाकर उनसे छुड़ाते थे।
वे सदा सत्य में प्रतिष्ठित एक सजग प्रहरी थे, अतएव सार्वभौम सत्य की उद्घोषणा करते हुए सबको जगाते चेताते थे। सबको समान रूप से सुख-शांति मिले, सब सदाचार-सत्यज्ञान के पथ पर चलें और इस संसार सागर से उद्धार पायें, यही उनके जीवन का विशेष प्रयोजन था ।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे सद्गुरु कबीर साहेब अपनी परम ज्ञानस्वरूप स्थिति में अधिकाधिक प्रतिभासित होते गए और सारे जन-समाज में छाते गए। विशेषतः संत भक्तों के बीच में वे सर्वाधिक सम्मानित प्रशंसित हुए। दिन-दिन उनके तेजोमय स्वरूप एवं सार ज्ञान की प्रसिद्धि सब ओर होने से बहुत लोग दूर-दूर से उनका ज्ञान-सत्संग सुनने तथा अपनी भ्रम-शंकाओं को मिटाने के लिए उनके पास आने लगे।
स्वयं सद्गुरु कबीर साहेब भी दया-भाव से लोगों की भलाई करने, उन्हें बुराइयों के संकट से उबारने और अपने सत्यज्ञान का प्रचार- प्रसार करने के लिए गांव-नगर दूर-दूर घूमने निकलते थे। वे देश-विदेश में गए, जैसा कि उन्होंने बीजक में अपने शब्दों में कहा है-‘देश विदेश हाँ फिरा, गांव- गांव की खोरि।’
उनके घूमने ओर लोगों से मिलने से सम्बद्ध उनकी बहुत-सी कथाएं पढ़ने-सुनने को मिलती हैं। उस समय देश में सबसे बड़े दो ही जाति- सम्प्रदाय- हिन्दू एवं मुसलमान थे, अतएव कबीर साहेब ने उनके नाम अपने शब्दों में लिए हैं। उन दोनों वर्गों के बहुत से हिन्दू-मुसलमान उनके अनुयायी एवं शिष्य हो गए और उनके दर्शाये ज्ञान-पथ पर चल पड़े। इसीलिए वे हिन्दुओं के गुरु और मुसलमानों के पीर कहलाए।
सद्गुरु कबीर साहेब जहां भी रहे या गए वहां उन्होंने मानव समाज को समुन्नत एवं सुविकसित होने का सदुपदेश किया। वे मानवता का शोषण एवं धर्म का पतन कैसे देख सकते थे ? उन्होंने सबको ऊंचा उठाने, अच्छा खुशहाल बनाने का भरपूर प्रयास किया। उन्होंने अपनी टकसार शब्द-वाणियों में सब भ्रष्टाचार,
व्यर्थ अपवादों एवं परम्परागत तुच्छ मान्यताओं को नकारकर सर्वथा शुद्ध ज्ञान- विचार तथा सदाचार पर आधारित सर्वहित के सच्चे ‘मानव धर्म’ को वर्णित किया है। सम्पूर्ण मानव-जाति की भलाई के लिए उन्होंने सब मानवों की एकता, • समानता और उनके परस्पर सद्भाव एवं सद्व्यवहार पर जोर दिया।
उन्होंने ऊंच- नीच तथा छूत-अछूत के भेदभाव को अनुचित एवं बड़ा दोष बताते हुए समझाया है कि प्रत्येक मानव समादरणीय है और उसे समान रूप से सुख पाने एवं अपना कल्याण करने का अधिकार है।
बीजक के एक शब्द में वे कहते हैं-
एकै त्वचा हाड़ मल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा । एक बुन्द से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शूद्रा ॥ रजोगुण ब्रह्मा तमोगुण शंकर, सतोगुणी हरि होई । कहहिं कबीर राम रमि रहिये, हिन्दू तुरुक न कोई ॥
“सभी मानव एक जैसे चाम, हाड़, मल-मूत्र, रक्त तथा मांस का शरीर धारण किए हैं। एक ही प्रकार के रज-वीर्य से सृष्टि रची है, फिर कौन ब्राह्मण और कौन शूद्र है। रज-तम-सत् ये तीनों गुण ब्रह्मा, शंकर तथा विष्णु रूप हैं। यहां न कोई हिन्दू है और न मुसलमान, सब समान सजाति हैं।
अपने भीतर के आत्माराम में रमे रहो, वही सुखदायी है।” उनके कथन का गहन आशय यह रहा है कि कोई भी मनुष्य वर्ण-जाति, घर-परिवार एवं धन-बलादि से बड़ा नहीं हो जाता, प्रत्युत सत्याचरण एवं उच्च ज्ञान-विचार से बड़ा तथा श्रेष्ठ होता है। बिना ज्ञान-विचार के केवल खाने-भोगने वाला मनुष्य पशु के समान है।
सद्गुरु कबीर साहेब का उपदेशित ज्ञान निष्पक्ष, निर्मल एवं निभ्रत है। उन्होंने अपनी शब्द-वाणियों में अपना समूचा सत्यज्ञानोपदेश मानव को सामने रखकर किया। उनकी समस्त शब्द-वाणियां मानवमात्र के कल्याण के लिए हैं, जिनमें उन्होंने मानव को मानव-जीवन की महत्ता एवं उसके कल्याण का उपाय बताया है।
उन्होंने समझाया है कि यह मनुष्य जन्म दुर्लभ है, पुनः नहीं मिलता। जैसे पका हुआ फल गिर पड़ता है तो पुनः डाल पर नहीं लगता। अतः इस मनुष्य- जीवन को पाकर यदि अबकी बार चूक गए, अर्थात् उत्तम रहनी गहनी एवं ज्ञान- साधना से अपना कल्याण नहीं कर पाए तो जन्म-मरण के चक्र में दुखों की मार सहनी पड़ेगी। यथा- पड़कर अनंत
मानुष जन्म दुर्लभ है, बहुरि न दूजी बार। पक्का फल जो गिर पड़ा, बहुरि न लागै डार ॥ मानुष जन्म नर पायके, चूके अबकी घात । जाय परे भवचक्र में, सहे घनेरी लात ॥ इस संसार सृष्टि में चौरासी लाख जीव-योनियां बताई गई हैं। उनमें सबसे बड़ा मनुष्य है क्यूंकि मनुष्य में सोचने समझने के साथ साथ गुरु भक्ति करने की भी क्रिया इसे और सब से महान बनता है।
आज से करीब 600 वर्ष पूर्व करीब 1398 ईसवी में सद्गुरु Kabir साहेब वाराणसी के लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर परगट हुए। (उनका जन्म नहीं हुआ वो स्वयम प्रगट हुए ) ज्येश्ठ का महीना था।
पूरणमासी का रात था। जब सद्गुरु Kabir साहेब प्रगट हुए। तब लहरतारा तलाब पूणतः प्रकाशमय हो गया था। जो की कुछ दुरी पर बैठे अस्टाॅनन्द स्वामी ध्यान में बैठे थे। जब प्रकाश हुआ तब उनकी आँख खुल गयी और वो लीला उन्होंने स्वयम देखा था ।
सद्गुरु कबीर साहेब उस कमल के पुष्प पर एक बच्चा का स्वरुप लेकर खेलने लगे जब सुबह निरु अपनी पत्नी नीमा को गौना कराकर लेकर आ रहे थे। तो नीमा जी को प्यास लगी तो वो निरु से बोली की मुझे बहुत प्यास लगी है। तो निरु बोले के यही थोड़े दूर पर तलाब है। जाओ पानी पी कर आ जाओ नीमा जी पानी पिने चल दी जब तालाब पर पहुंची तो वो किनारे से पानी पी ली और
Kabir Das ka Jivan Parichay
अब चलने को हुयी तभी उनका नजर कुछ दूर कमल के पुष्प पर पड़ी। एक सूंदर सा बालक कमल के पुष्प पर कौतुहल कर रहा था नीमा जी देखि तो उनसे रहा नहीं गया और वो जा कर उस बच्चे को गोद में उठा ली।
और इधर उधर देखने लगी के ये किसका बच्चा है।आवाज भी लगाई लेकिन कोई भी नहीं दिखा फिर नीमा जी उस बालक को लेकर निरु के पास पहुंची निरु बच्चे को देख कर बोले ये किसका बच्चा उठा लायी।
तो नीमा जी ने सारी बात बता दी फिर निरु बोले के इस बच्चे को ले जाओ जहा से लायी हो वही छोड़ आओ। तो नीमा जी बोलने लगी के नहीं कितना प्यारा बच्चा है। मै इसे अपने घर ले चलूंगी तो निरु बोले के नहीं अभी मैं तुम्हे गौना कराकर ला रहा हूँ।
और बच्चा साथ में लोग देखेंगे तो क्या -क्या लोग बोलेंगे तुमको अंदाज़ा नहीं है इस बात पर रिक- झिक हो रही थी तभी वो बालक बोल पड़ता है मुझे अपने साथ ले चलो मै पहले के किसी कारन से तुम्हारे पास आया हूँ फिर वो लोग अपने घर ले कर चल दिए ।
Kabir Das Biography in Hindi, बालक कबीर का नाम रखने के लिए काजी का आना
कुछ दिन बाद बच्चे का नाम रखने के लिए काजी को बुलाया गया। काजी जब नाम रखने के लिए कुरान देखता है तो उसमे खुदा का ही नाम आ रहा है। वो बार-बार देखता है बार-बार वही नाम आ रहा है तो इस बात पर काजी काफी गुस्से में झिझक कर बोलता है।
ये क्या हो रहा है तभी वो बालक बोलता है मेरा नाम Kabir है। दूसरा नाम रखने की जरुरत नहीं है। काजी अचंभव में पड़ जाता है और वहा से चला जाता है।
बालक कबीर जब थोड़ा बड़ा हो जाता है तब वो किसी ना किसी से सत्संग करने लगता है बालक कबीर की बात सुनकर लोग अचंभव में पड़ जाते है। उसी में कुछ लोग कह देते तुम ने गुरु नहीं किया है।
Kabir
तो इस ज्ञान का कोई मतलब नहीं है इस बात पर बालक कबीर ने सोचा के गुरु बना लेता हूँ और फिर बालक कबीर रामानंद स्वामी के पास जाता है। और बोलता है के स्वामी जी मुझे अपना शिष्य बना लीजिये लेकिन उस समय का ऐसा दौर था।
के रामानंद स्वामी छोटी जात वलों का मुँह भी नहीं देखते थे। तो वो शिष्य कैसे बना लेते वो दूर से ही मना कर दिए बालक Kabir वाहा से वापस आ जाता है। एक दिन की बात है रामानंद स्वामी सुबह 5 बजे तालाब पर असनान करने जाते थे। तो उस दिन बालक Kabir तालाब के सीढ़ियों पर लेट गया।
जब स्वामी जी असनान करने आये तो अँधेरे में बालक कबीर को नहीं देखे और उनके पाँव से बालक कबीर को चोट लग गयी। और वो रोने लगा तभी स्वामी जी बोलेन के चुप हो जा बच्चा राम-राम बोलो सब ठीक हो जायेगा बालक Kabir चुप हो गए और राम-राम कहते हुए वहां से चले गए।
अब बालक Kabir किसी से भी सत्संग करता तो वो लोग पूछते के तुम्हारा गुरु कौन है। तो वो बोलते के रामानंद स्वामी मेरे गुरु है अब धीरे धीरे ये बात रामानंद स्वामी के पास पंहुचा के एक छोटी जात का बचा है उसका नाम कबीर है। वो बोलता है के मेरे गुरु रमानन्द स्वामी है।
स्वामी जी जब ये बात सुने तो नाराज़ होते हुए बोले के उस बालक को बुलाओ मै पूछता हूँ के कब मैंने उसको अपना शिष्य बनाया स्वामी जी के आज्ञा से एक शिष्य जाता है और बुला लाता है बालक Kabir को
जब Kabir को स्वामी जी देखते है तो पूछते है के तुम सबसे बोलते फिरते हो के तुम्हारा गुरु मै हूँ मैंने तुम्हे गुरु दीक्षा तो दी नहीं तो तुम मेरे शिष्य कैसे हुए। तो बालक कबीर बोलता है गुरु मंत्र क्या है तो स्वामी जी बोले राम नाम तब कबीर बोलते है वही नाम आप मुझे बोलने के लिए बोले थे।
तो स्वामी जी बोलते है के मैं कब बोला था। Kabir बोलते है के उस दिन जब आप तालाब पर नहाने जा रहे थे। तो आपके पाव से मुझे चोट लग गया था तो आप बोले राम नाम बोलो बच्चा।
बालक कबीर ने एक अपनी लीला दिखाई
स्वामी जी चौक कर बोलते है वो बच्चा बहुत छोटा था। और तुम काफी बड़े दीखते हो तभी बालक कबीर ने एक अपनी लीला दिखाई और वही बालक बन कर स्वामी जी के पाव के पास पड़ कर बोलते है। के गुरु जी यही बच्चा था न स्वामी जी कुछ बात समझ जाते है और बोलते है उठ जाओ कबीर ,
और Kabir उठ जाते है। अब स्वामी जी कबीर को अपने आश्रम पर रहने आने जाने की अनुमति दे देते है कबीर एक और कला दिखते है। स्वामी जी हर दिन रात्रि में ध्यान में बैठते थे उस दिन भी स्वामी जी ध्यान में बैठे तो हर दिन स्वामी जी के ध्यान में ठाकुर जी को देखते थे।
और आज ध्यान में बैठे तो ध्यान में कबीर जी को देखे स्वामी जी आंतरिक जानकार थे। तो वो सब बात समझ गए। फिर उसके बाद से हमेशा स्वामी जी और कबीर में आंतरिक ज्ञान की बातें हमेशा होने लगी।
योगी गोरखनाथ का सत्संग के लिए आना
कबीर अपने घर चले गए कुछ दिन के बाद वहाँ योगी गोरखनाथ आते है।और बोलते है के मैं आज के सातवे दिन आऊंगा तुम से सत्संग करने अगर तुम हार गए तो मेरी पराधीनता स्वीकार करना पड़ेगा और चले जाते है अब इस बात को लेकर सब चिंतित रहने लगते है। उस समय गोरखनाथ का बहुत बोलबाला था।
क्यूंकि गोरखनाथ बहुत से आश्रम वालों को पराजित कर चुके थे उनका वास्तविक काम ये था के वो योगसाधना से सिद्धि प्राप्त कीये थे। तो वो सत्संग करने के लिए त्रिशूल को जमींन में धसा कर त्रिशूल के नुख पर बैठ जाते और बोलते के मेरे बराबरी में आकर सत्संग करो और कोई कर नहीं पाता।
और वो पराजित हो जाता इसी बात से सब चिंतित थे। तभी कबीर आश्रम में आते है सबको चिंतित देख चिंता का कारन पूछते है। तो उनको ये सारी बात बताई जाती है तब कबीर बोलते है गुरु जी आप चिंता मत कीजिये। गोरखनाथ आएंगे तो बोल दीजियेगा के पहले मेरे शिष्य से सत्संग कर लो फिर मुझ से करना स्वामी जी बोले ठीक है।
गोरखनाथ और कबीर जी का सत्संग
अब वो दिन आ गया गोरखनाथ आये और बोले आओ रामानंद सत्संग करो स्वामी जी बोले पहले मेरे शिष्य से सत्संग करो बाद में मुझसे करना। तो गोरखनाथ बोले ठीक है गोरखनाथ अपना वही काम किये और त्रिशूल को जमींन में गाड़ कर त्रिशूल के नुख पर बैठ गए।
और बोले आ जाओ मेरे बराबरी में और सत्संग करो तो कबीर कुछ ढूंढते है तो उन्हें एक सुतली की गठा दीखता है। कबीर उस सुतली को पकड़ कर आसमान के तरफ फेक देते है और वो सुतली आकाश में जा कर रुक जाता है।
कबीर उस सुतली को पकड़ कर आसमान में जा कर बैठ जाते है और बोलते है गोरखनाथ आ जाओ और सत्संग करो अब गोरखनाथ काहेको वह रुके वो अपना त्रिशूल उखाड़ कर भाग चले। आगे जानेंगे सद्गुरु कबीर साहेब के ईश्वर कौन थे। अब आगे की जो भी बात है वो दूसरे भाग में बताऊंगा साहेब बंदगी