Sandhya Path | Gyan Guddadi

<ज्ञान गुदड़ी संध्या पाठ>

 

 

Gyan Guddadi

Sandhya Path 

लिगन कठिन मेरे भाई, गुरु से लगन कठिन मेरे भाई।

लगन लगे बिनु काज न सरिहैं, जिव परलयतर जाई ।। 

मिरगा नाद शब्द का भेदी, शब्द सुनन को जाई। 


सोई शब्द सुनि प्राण देत हैं, तनिको न मन में डराई ।। ..


तजि धन धाम सती होय निकसी, सत्त करन को जाई।


पावक देखि डरे  नहीं  मनमें; कूदि परे सर माँहीं।।


स्वाति बूंद लिए रटत पपीहरा, पिया-पिया रट लाई।. 3


प्यासे प्राण जाय क्यों न अबही, और नीर नहें भाई।।. है,


दो दल आनि जुड़े जब सन्मुख, शूरा लेत लड़ाई |


टूक टूक होय गिरे धरनी पै, खेत छांड़ नही  जाई ।। ं


छाड़ो  अपने तन की आशा, निर्भय होय गुन गाई।


कहैँ कबीर ऐसी लौ लावे, सहज मिले गुरु आई। 

साखी :

गुरु को कीजै वन्दगी, कोटि-कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, गुरु कर ले आप समान ।।

गुरु मूर्ति गति चन्द्रमा, सेवक नयन चकोर। 
अष्ट प्रहर निरखत रहो, गुरु मूर्ति की ओर।।

निर्विकार निर्भय तुंही, और सकल भय माहि। 
सब पर तेरी साहबी, तुम पर साहिब नाहीं ।।

संध्या सुमिरन आरती, भजन भरोसे दास।
मनसा वाचा कर्मणा, जब लग घट में श्वांस।।

श्वांस-श्वांस में नाम ले, वृथा श्वांस मति खोय।
ना जाने इस श्वांस को, आवन होय न होय ।।

श्वांसा  की कर सुमिरणी, कर अजपा को जाप |
परम तत्त्व को ध्यान धर, सोऽहं  आपहि आप ।।

सोऽहं  पोया पवन में, बांधो सुरत सुमेर । 
ब्रह्मा गांठ हृदय धरो, इस विधि माला फेर ।।

माला श्वासोच्छवास की, फेरेंगे कोई दास |
चौरासी भरमें नहीं, कटे काल की फाँस ।।

सांझ परे दिन आथवे, चकवी दीन्हा रोय । 
चल चकवा तहाँ जाइये, जहाँ रैन दिवस नहिं होय ।।

रैन  की बिछुरी चाकवी, आनि मिली परभात |
जो जन जे बिछुरे नाम सों, दिवस मिले नहिं रात ।।

सतगुरु  मोहि. निवाजिया, दीन्हा अमर मूल ।
शीतल शब्द कबीर का, हंसा करे किलोल ।।

हंसा तुम जनि डरपिहो, कर मेरी परतीत ।
अमर लोक पहुँचायहों, चलो सो भवजल जीत ।।

भवजल में बहु काग हैं, कोइ कोइ हंस हमार। 
कहँहिं कबीर धर्मदास सों, खेव उतारो पार ।। 

बिनवत हूँ कर जोरि के, सुन गुरु कृपानिधान । 
संतन को सुख दीजिये, दया गरीबी ज्ञान ।।

दया गरीबी बन्दगी, समता शील करार ।
इतने लक्षण साधु के, कहँहिं कबीर विचार ।।

धनी ऊपर धर्मदास है, सत्यनाम की टेक ।
रहिता पुरुष कबीर हैं, चलता है सब भेष ।।

भेष बराबर हो रहे, भेद बराबर नाहिं ।
तौल बराबर घूँघची, मोल बराबर नांहि ।।

केवल नाम केवल गुरु, बाला पीर कबीर । 
ठाढ़े हंस विनती करें, दर्शन देहु कबीर ।। 

आनन्द मंगल आरती, सतगुरु सत्यकबीर ।
यम के फंदा काटि के, हंस लगावें तीर ।।

आरती 

ज्ञान आरती अमृत बाणी, पूरण ब्रह्म लेहू पहिचानी ।
जाके हुकुम पवन औ पानी, वाकी गति कोई बिरले जानि । |

त्रिदेवा मिलि जोत बखानी, निराकार की अकथ कहानी ।
यही आशा सब हिल मिल ठानी, भर्मि भर्मि भटके नर प्राणी ।।

दृष्टि बिना दुनिया बौरानी, साहब छाँड़ि जम हाथ बिकानी ।
सकल सृष्टि हमही उतपानी, शील संतोष दया की खानी ॥।

सुख सागर में करो स्नाना, निर्भय पावो पद निरवाना ।
कहूँहिं कबीर सोइ संत सुजाना, जिन-जिन शब्द हमारो माना ।।

ज्ञान्स्रोत्र

कबीर :- सत्‌ सत्‌ के नाम से, सत्य सागर भरा, सत्य का नाम तिहूँ लोक छाजा ।
संतजन आरती करें, प्रेम तारी धरें; ढोल नीसान मृदंग बाजा ।।

भक्ति सांचीं किया. नाम निश्चय लिया, शुन्य के
शिखर ब्रह्मांड गाजा, सत्य कबीर सर्वज्ञ साहेब
मिले, भजो सत्यनाम क्या रंक राजा ।।

हम दीन दुनी दरवेशा, हम किया सकल परवेशा। 
हम दुवा सलामत लेखा, हम शब्द स्वरूपी पेखा ।।

हम रुण्ड मुण्ड में फीरा, हम फाका, फिकर फकीरा ।
हम रमे कौन की नाल, हम चले कौन की चाल ।।

हम सर्वंगी सहजे रमे हमारा वार पार ।
वार भी हम हीं पार भी हम ही, नाना दरिया तीर ।। 

सकल निरन्तर हम रमे, हम गहरे गंभीर ।
खालिक खलक खलक के माहीं, यौं गुरु कहहिं कबीर ।। 

सत्यनाम की आरती, निर्मल भया शरीर । 
धर्मदास लोके गये, गुरु बहियां मिले कबीर ।। 

धर्मदास लोके गये, छोड़ि सकल संसार ।
हंसन पार उतारहीं, गुरु धर्मदास परिवार ।। 

मत्य सुक़त लौलीन हैं, ज्ञान ध्यान स्थीर। 
अजावन वह पुरुष हैं, सो गहि लागो तीर ।। 

सत्त सत्त का भया प्रकाशा, जरा मरण की छूटी आशा ।
शब्द न विनसे विनसे देही, कहहिं कबीर हम एल सनेही ।।

पांच तत्त्व तीन गुन पेले, रमिता रहे शब्द सो खेले । 
कहाँहि कबीर सो हंस हमारा, बहुरि न देखे यम का द्वारा ।।

रहु रे काल पराधिया, दुर्बल तोर शरीर। 
सत् सुकृत की नाव है, खेवे सत्य कबीर ।।

भव भंजन दुःख परिहरन , अम्मर करन शरीर। 
आदि युगादि आप हो , गुरु चारो युग कबीर ।।

विज्ञानं स्तोत्र 

अति लौलीन चिन्हत ज्ञानी।

Gyan Guddadi प्रारम्भ

धर्मदास बिनवे कर जोरी, साहेब सुनिये बिनती मोरी काया गुदड़ी कहो सन्देशा, जासे जिव का मिटे अंदेशा ||

अलख पुरुष जब किया विचारा, लख चौरासी धारा डारा । पाँच तत्त्व की, गुदड़ी बीनी, तीन गुनन से ठाढ़ी कीनी ॥

तामें जीव ब्रह्म और माया, सम्रथ ऐसा खेल बनाया । जीवन पाँच पचीसों लागे, काम क्रोध मोह मद पागे काया गुदड़ी का विस्तारा, देखो संतों अगम सिंगारा ।

चाँद सूरज दो पेबंद लागे, गुरु प्रताप से सोवत जागे शब्द की सुई सुरति का डोरा, ज्ञान की टोभन सिरजन जोरा अब गुदड़ी की करु हुशियारी, दाग न लागे देख विचारी ।।

सुमति का साबुन सिरजून धोई, कुमति मैल को डारो खोई जिन गुदड़ी का किया विचारा, सो जन भेटे सिरजनहारा धीरज धुनी ध्यान घर आसन, सत की कौपीन सहज सिंघासन युक्ति कमंडल कर गहि लीन्हा, प्रेम पावरी मुर्शिद चीन्हा सेली शील

विवेक की माला; दया की टोपी तन धर्मशाला  महर मतंगा मत वैशाखी, मृगछाला मन ही को राखी। निश्चय धोती पवन जनेऊ, अजपा जपे सो जाने भेऊ रहे निरन्तर सतगुरु दाया, साधु संगति करि सब कछु पाया ।।

लौ की लकुटी हृदया झोरी, क्षमा खराऊँ पहिर बहोरी। मुक्ति मेखला सुकृत सुमरणी, प्रेम पियाला पीवै मौनी उदास कूबरी कलह निवारी, ममता कुत्ती को ललकारी। युक्ति जंजीर बाँध जब लीन्हा, अगम अगोचर खिरकी चीन्हा ।।

वैराग त्याग विज्ञान निधाना, तत्त्व तिलक दीन्हा निरबाना। गुरुगम चकमक मनसा तूला, ब्रह्म अग्नि प्रगट कर मूला । संशय शोक सकल भ्रम जारा, पाँच पचीसों प्रगटहिं मारा। दिलका दर्पण दुविधा खोई, सो वैरागी पक्का होई।

शून्य महल में फेरी देई, अमृत रस की भिक्षा लेई । दुःख सुख मेला जग का भाऊ, त्रिवेणी के घाट नहाऊ तन मन शोध भया जब ज्ञाना, तब लखि पावे पद निरवाना। अष्ट कमल दल चक्र सूझे, योगी आप आप में बूझे ।।

इंगला पिंगला के घर जाई, सुषमनि नारी रहे ठहराई।

ओऽहं सोऽहं तत्त्व विचारा, बंकनाल में किया संभारा ।। मन को मार गगन चढ़ि जाई, मान सरोवर पैठि नहाई । अनहद नाग नाम की पूजा, ब्रह्म वैराग देव नहिं दूजा ||

छूटि गये कशमल कर्मज लेखा, यह नैनन साहब को देखा । अहंकार अभिमान बिडारा, घट का चौका कर उजियारा ।। चित कर चंदन मनसा फूला, हितकर संपुट करि ले मूला । श्रद्धा चँवर प्रीति कर धूपा, नौतम नाम साहेब को रूपा ।।

गुदड़ी पहिरे आप अलेखा जिन यह प्रगट चलायो भेषा । साहेब कबीर बकस जब दीन्हा सुर नर मुनि सब गुदड़ी लीन्हा ।। Gyan Guddadi  पढ़ें प्रभाता, जन्म जन्म के पातक जाता ।

Gyan Guddadi पढ़े मध्याना, सो लखि पावै पद निरवाना || संध्या सुमिरण जो नर करहीं, जरा मरण भवसागर तरहीं । कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, Gyan Guddadi करो प्रकाशा

 

और अधीक पढीये

 

Gyan Guddadi साखी

माला टोपी सुमरणी, सत्गुरु सत्गुरु दिया बक्शीश पल पल गुरु को बंदगी, चरण नमावूं शीश 1

भवभंजन दुःख परिहरण, अम्मर करन शरीर । आदि युगादि आप हो, गुरु चारों युग कबीर ।। बंदीछोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंधन भेष का, धन धन कहै संसार || मैं कबीर बिचलूं नहीं, शब्द मोर सम्रथ । ताको लोक पठाइ हूँ, जो चढ़े शब्द को रथ ।

वंदना साखी

वारो तन मन धन सबै, पद परखावन हार । युग अनंत जो पचि मरे, बिन गुरु नहिं निस्तार ।। सरवर तरुवर संतजन, चौथा बरसे मेह । परमारथ के कारणे, चारों धारी देह ।। जीवन यौवन राजमद, अविचल रहे न कोय । जो दिन जाय सत्संग में, जीवन का फल सोय ।। सन्ध्या सुमिरन कीजिये । सुरति निरति एक तार । करो अर्पण गुरु चरन में, नाशे विघ्न अपार ।।

और अधीक पढीये

Gyan Guddadi  दयासागर

।। गुरु दयासागर ज्ञान अग्र, शब्द रूपी सद्गुरुम्। .. तासु चरण सरोज बंदौं, सुखदायक सुख सागरम्।।

योगजीत अजित अम्मर, भाषते सत् सुकृतम्। दयापाल , दयाल स्वामी ज्ञान दाता सुस्थिरम्।।

क्षमा शील संतोष समिता, आनंद रूपी हृदयम्। सहज भाव विवेक सुस्थिर, निर्माया नि:संशयम्।

निर्मोही निर्वैर निर्भय, अकथ कथिता अविगतम्। उपकार एवं उपदेश दाता मुक्ति मार्ग सद्गुरुम् ।।

दासभाव की प्रीति विनती, भक्ति करण करावनम्। चौरासी बंधन कर्म खंडन, बंदीछोर कहावनम्।

त्रिगुण  रहीता सत्य वक्ता, सत्यलोक निवासितम्। सत्यपुरुष जहां सत्य साहेब, तहां आप विराजितम्।

युगन-युगन सत्यपुरुष आज्ञा, जीवन कारण पगुधरम्। दीन लीन अचिन्त होय के, जगत में डोलत फिरम्।।

करुणामय कबीर केवल सुखदायक सर्व लायकम। यम भयंकर मान मर्दन, दुःखित जीव सहायकम्।

धर्मदास कर जोरि विनावे, दया करो मन वशकर्म करुं सेवा गुरु भक्ति अविचल, निषदिन अराधों सुमिरनम्

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Gyan Guddadi मंत्रयोग नामधुन

जयं करुणामय जय कबीर, सत सुकृत गाहि लागो तीर ।

भवसागर है गहिर गंभीर, खेई उतारे सत्य कबीर ।

जन्म-जन्म की मेटे पीर, ताते सुमिरो सत्य कबीर ।।

धर्मदास गुरु सेवे कबीर, तांते लागे भव से तीर ।

जो जो आवे शरण कबीर, सो सब लागे भव से तीर ।।

आधि व्याधि उपाधि शरीर, यह सब नाशे जपत कबीर ।

काम-क्रोध मद लोभ हैं वीर, यह सब डरते सुनत कबीर ।

सेवक सनतो सुमिरो कबीर, कर्म धर्म की छूटै जंजीर ।

जब बोलो तब बोलो कबीर, जासे पावो हंस शरीर

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