Kabir Ke Dohe | Kabir Saheb ke 50 Anmol Dohe; Arth Sahit

Kabir Ke Dohe: कबीर साहेब जी के 50 प्रसिद्ध और अनमोल दोहे अर्थ सहित पढ़ें। संत कबीर दास के ज्ञान, भक्ति, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षाओं से भरपूर दोहों का संपूर्ण संग्रह हिंदी में।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे 

Kabir Ke Dohe

 

Kabir Ke Dohe | कबीर के दोहे हिंदी में अर्थ सहित

श्वासा की कर सुमिरनो, कर अजपा को जाप।
परम तत्त्व को ध्यान धर , सोऽहं आपे आप ॥

kabir ke dohe

पांच तत्वसे है नहीं , स्वासा नहीं शरीर। 
अन्न अहार करता नहीं , ताका नाम कबीर।। 

अर्थ – कबीर जी कहते है , पांच तत्त्व से मै नहीं बना हूँ , नाही मेरे शरीर में स्वासा है।
अन्न और जल आहार भी नहीं करता, सभी से जो परे है उसी का नाम कबीर हैं।।

नाम लिया तीन सब लिया , सकल वेद का भेद। 
बिना नाम नरके गए , पढ़ी – पड़ी चारो वेद।।

अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने परमात्मा के सच्चे नाम का स्मरण कर लिया, उसने मानो सभी वेदों का सार और रहस्य समझ लिया। केवल वेदों को पढ़ लेने से लाभ नहीं होता। यदि मनुष्य ईश्वर के नाम का जाप और भक्ति नहीं करता, तो चारों वेद पढ़ने के बाद भी उसे आध्यात्मिक कल्याण प्राप्त नहीं होता। इसलिए सच्चे नाम का स्मरण ही मुक्ति और परम ज्ञान का मार्ग है।

साहब से सब होता है , बन्दे से कछु नाहिं। 
राई सो परवत  करे , परवत राई माहिं।।

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि इस संसार में सब कुछ परमात्मा (साहब) की शक्ति से होता है, मनुष्य अपने बल से कुछ भी नहीं कर सकता। परमात्मा चाहे तो एक छोटे से राई के दाने को पर्वत जितना बड़ा बना दे और बड़े से बड़े पर्वत को राई के दाने जितना छोटा कर दे। अर्थात् ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इसलिए मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए और सदैव परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिए।

परमात्मा की शक्ति असीम है। वह असंभव को संभव और संभव को असंभव बना सकता है, इसलिए मनुष्य को घमंड छोड़कर ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।

 
 
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दुर्लभ मनुष्य जनम है देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पति झड़े बहुरि न लागे डार ॥1॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत दुर्लभ और अनमोल होता है। यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जिस प्रकार पेड़ से गिरा हुआ पत्ता दोबारा उसी डाल पर नहीं लग सकता, उसी प्रकार एक बार बीत जाने पर यह मानव जीवन फिर वापस नहीं आता। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का सदुपयोग करते हुए अच्छे कर्म, भक्ति और आत्मकल्याण के कार्य करने चाहिए।
मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। जैसे पेड़ से गिरा पत्ता फिर शाखा से नहीं जुड़ता, वैसे ही यह जीवन बार-बार नहीं मिलता। इसलिए समय का सदुपयोग कर भक्ति और सत्कर्म करने चाहिए।

सच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।
जाके हृदय साँच है ताके हृदय आप॥2॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि सत्य (सच) से बड़ा कोई तप नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस व्यक्ति के हृदय में सच्चाई होती है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा का वास होता है। इसलिए मनुष्य को हमेशा सत्य का पालन करना चाहिए और झूठ से दूर रहना चाहिए।
   सच बोलना और सच्चा जीवन जीना सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति सच्चा होता है, उस पर भगवान की कृपा बनी रहती है।

साई इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय।
मै भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए॥3॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें केवल उतना ही धन और साधन दें, जिससे उनके परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह हो सके। वे न तो अधिक धन की इच्छा रखते हैं और न ही अभाव में रहना चाहते हैं। उनकी कामना है कि वे स्वयं भी भूखे न रहें और उनके द्वार पर आने वाला कोई साधु-संत या अतिथि भी भूखा न लौटे। इस साखी में संतोष, दया और परोपकार की भावना का संदेश दिया गया है।

माटी कहे कुम्भार से तू क्यों रौदे मोए।
एक दिन ऐसा आएगा मै रौंदूंगी तोए॥4॥

अर्थ:
इस साखी में कबीर साहेब जी कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है, “आज तुम मुझे पैरों से रौंदकर घड़ा और बर्तन बना रहे हो, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हारा शरीर इसी मिट्टी में मिल जाएगा और तब मैं तुम्हें रौंदूँगी।”

इस साखी के माध्यम से कबीर साहेब मनुष्य को अहंकार न करने और मृत्यु को सदैव याद रखने की शिक्षा देते हैं। संसार में कोई भी व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली या बड़ा क्यों न हो, अंत में उसे मिट्टी में ही मिल जाना है।

Kabir Ke Dohe

माला फेरत युग गया फिरा ना मनका फेर।
कर का मन डारी दे मन का मनका फेर॥5॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि लोग वर्षों तक हाथों से माला फेरते रहते हैं, लेकिन उनका मन नहीं बदलता। केवल बाहरी पूजा-पाठ करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। यदि सच्ची भक्ति करनी है तो हाथ की माला छोड़कर अपने मन को बदलो, बुरे विचारों को त्यागो और मन को ईश्वर की ओर लगाओ। वास्तविक साधना मन की शुद्धि और आंतरिक परिवर्तन में है, न कि केवल दिखावे की पूजा में।

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए।
माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आय फल होय॥6॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि मनुष्य को धैर्य रखना चाहिए, क्योंकि संसार में हर कार्य अपने समय पर ही पूरा होता है। जैसे माली किसी पेड़ को चाहे सौ घड़े पानी से सींच दे, फिर भी फल तभी लगते हैं जब उनकी उचित ऋतु (मौसम) आती है। उसी प्रकार जीवन में सफलता, ज्ञान और अच्छे परिणाम समय आने पर ही प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें अधीर होने के बजाय धैर्य और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

क्षीर रूप सतनाम है नीर रूप व्योहार।
हंस रूपी कोई साधुजन है जो शब्द का करत छननहार ॥7॥

अर्थ:
सतनाम दूध के समान शुद्ध और अमूल्य है, जबकि संसार के व्यवहार पानी के समान हैं। जिस प्रकार हंस दूध और पानी के मिश्रण में से केवल दूध ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार सच्चा साधु और विवेकी व्यक्ति सतगुरु के शब्दों का विचार करके उनमें से सत्य ज्ञान को ग्रहण करता है और असत्य बातों को छोड़ देता है।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

 

अकह कहन में कहिये कैसा ।
आदि ब्रह्म जैसा को तैसा ॥8॥

अर्थ:
जिस परमात्मा का वास्तविक स्वरूप शब्दों में बताया ही नहीं जा सकता, उसका वर्णन कैसे किया जाए? आदि ब्रह्म (परम सत्य) जैसा आदि काल से था, आज भी वैसा ही है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता और वह मानव की वाणी तथा बुद्धि से परे है।

Kabir Ke Dohe

        सात समंदर की मसी करूँ लेखनी सब बनराई।
धरती सब कागद करूँ तापर गुरु गुण लिखा न जाय॥9॥

 अर्थ :
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि सातों समुद्रों की स्याही बना दी जाए, जंगल के सभी पेड़ों की कलम बना ली जाए और पूरी धरती को कागज़ बना दिया जाए, तब भी गुरु के गुणों और महिमा का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। गुरु की महिमा इतनी महान और अनंत है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।

संदेश :
इस साखी में कबीर साहेब ने गुरु की महानता का वर्णन किया है। गुरु ही ज्ञान का प्रकाश देकर मनुष्य को अज्ञानता से निकालकर सत्य का मार्ग दिखाते हैं, इसलिए उनके उपकारों का मूल्य कभी चुकाया नहीं जा सकता।

श्वास-श्वास में नाम ले बृथा श्वास मत खोए।
न जाने इस श्वास को आवन होए ना होए॥10॥

 अर्थ :
संत कबीर साहेब कहते हैं कि मनुष्य को अपनी हर सांस के साथ परमात्मा का नाम स्मरण करना चाहिए और जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। किसी को नहीं पता कि जो सांस अभी बाहर गई है, वह वापस आएगी या नहीं। इसलिए जीवन की अनमोल सांसों को संसार के मोह-माया में व्यर्थ न करके ईश्वर भक्ति और अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए।

Kabir Ke Dohe

दस द्वारे का पिंजरा तामे पंछी पौन।
रहने को अचरज नहीं जात अचम्भा कौन॥11॥

 अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर दस द्वारों (दो आंखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, मुख, गुदा और जननेंद्रिय) वाला एक पिंजरा है, जिसमें प्राण रूपी पक्षी (आत्मा) निवास करता है। इस शरीर में आत्मा का रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन जब यह आत्मा शरीर छोड़कर चली जाती है, तब यह सबसे बड़ा आश्चर्य होता है कि वह कहाँ चली गई और उसका क्या हुआ।

इस साखी के माध्यम से कबीर साहेब मानव जीवन की नश्वरता और आत्मा के रहस्य को समझाने का प्रयास करते हैं।

भावार्थ:
मनुष्य को अपने शरीर और सांसारिक मोह में अधिक आसक्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक दिन आत्मा इस शरीर को छोड़कर चली जाएगी। इसलिए जीवन का उपयोग ईश्वर भक्ति और सत्कर्मों में करना चाहिए।

मात पितु गुरु करहिं ना सेवा चारो ओर फिरत पूजत है देवा।
ते नर के काल नचावे आशा दे दे मुआवे॥12॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि जो लोग अपने माता-पिता और गुरु की सेवा नहीं करते, लेकिन चारों ओर घूम-घूमकर देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वे सच्चे धर्म के मार्ग पर नहीं हैं। ऐसे लोग संसार की आशाओं और इच्छाओं में फँसे रहते हैं। काल (मृत्यु) उन्हें तरह-तरह की उम्मीदें देकर जीवन भर नचाता रहता है और अंत में वे बिना परम सत्य को प्राप्त किए ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

संदेश:
माता-पिता और गुरु की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। केवल बाहरी पूजा करने से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करने और सच्चे ज्ञान को अपनाने से जीवन सफल होता है।

Kabir Ke Dohe 

कथनी अति गुण सी करनी विष की लोए।
कथनी तजि करनी करो तो विष से अमृत होए॥13॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि केवल अच्छी-अच्छी बातें करना आसान है, लेकिन उन बातों को अपने जीवन में अपनाना कठिन होता है। यदि व्यक्ति सिर्फ उपदेश देता रहे और स्वयं उसका पालन न करे, तो उसकी बातें विष के समान हानिकारक हो जाती हैं। लेकिन यदि वह केवल कहने के बजाय अच्छे कर्म करना शुरू कर दे, तो वही विष अमृत के समान लाभदायक बन जाता है। इसलिए मनुष्य को कथनी से अधिक करनी पर ध्यान देना चाहिए।

गुरु को कीजे बंदगी कोटि-कोटि प्रणाम ।
किट ना जाने भृंग को वह ( गुरु ) कर लीजिए आप सामान ॥ 14॥

अर्थ:
इस साखी में कबीर साहेब जी गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गुरु को करोड़ों बार प्रणाम करना चाहिए। जिस प्रकार भृंग (एक प्रकार का कीट) अपने ध्यान और प्रभाव से साधारण कीड़े को अपने समान बना देता है, उसी प्रकार सद्गुरु भी अपने ज्ञान, कृपा और उपदेश से अज्ञानी जीव को अपने समान ज्ञानवान और आत्मिक रूप से श्रेष्ठ बना देते हैं। इसलिए गुरु का स्थान अत्यंत महान और पूजनीय है।

गुरु को बार-बार प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि वे अपनी कृपा और ज्ञान से साधारण मनुष्य को भी महान बना देते हैं। जैसे भृंग कीड़े को अपने समान बना देता है, वैसे ही गुरु शिष्य को ऊँचा उठाकर आत्मज्ञान प्रदान करते हैं।

Kabir Ke Dohe

जगत जनायो जिन्ही सकल सो गुरु प्रगटे आय ।
जिन गुरु आँखिन देखियाँ सो गुरु दिया लखाय ॥ 15॥

 अर्थ :
संत कबीरदास जी कहते हैं कि जिस पूर्ण गुरु ने सम्पूर्ण संसार को उत्पन्न करने वाले परमात्मा का साक्षात् दर्शन किया है, वही सच्चा गुरु संसार में प्रकट होकर आता है। ऐसा गुरु अपने शिष्यों को भी उस परम सत्य और परमात्मा का ज्ञान कराता है, जिसे उसने स्वयं अपनी अनुभूति से देखा और जाना है।

अर्थात् सच्चा गुरु केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देता, बल्कि स्वयं परमात्मा का अनुभव करके अपने शिष्यों को भी उस दिव्य मार्ग का परिचय कराता है।

Kabir Ke Dohe

भली भई जो गुरु मिला नातर होती हानि।
दीपक ज्योति पतंग ज्यों पड़तयो पूरा जनि॥ 16॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि यह बहुत अच्छा हुआ कि मुझे सच्चे गुरु मिल गए, नहीं तो मेरा बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। जिस प्रकार पतंगा दीपक की लौ को देखकर उसकी ओर आकर्षित होकर उसमें गिर जाता है और जलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गुरु के ज्ञान के बिना मनुष्य भी संसार के मोह-माया में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ कर देता है। गुरु ही सही मार्ग दिखाकर जीव को पतन से बचाते हैं।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के 50 अनमोल दोहे 

भली भई जो गुरु मिला जासो पाया ज्ञान ।
घही माहि चबूतरा घटही माहिं दिवान ॥ 17॥

अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि यह बहुत अच्छा हुआ कि मुझे सच्चे गुरु मिल गए, जिनसे मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। गुरु के ज्ञान से मुझे पता चला कि जिस परमात्मा को लोग बाहर मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में खोजते हैं, वह वास्तव में हमारे अपने शरीर (घट) के भीतर ही विराजमान है। हमारे हृदय रूपी शरीर में ही उसका सिंहासन (चबूतरा) और दरबार (दिवान) लगा हुआ है। इसलिए ईश्वर को बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने का प्रयास करना चाहिए।

ज्ञान प्रकाशी गुरु मिला सोजन बिसरि न जाय।
जब गोविन्द कृपा करी तब गुरु मिलिया आय ॥ 18 ॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि जब हमें ऐसा सद्गुरु मिल जाता है जो अज्ञानता के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देता है, तो उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। ऐसा गुरु हमें तभी मिलता है जब भगवान (गोविन्द) की विशेष कृपा होती है। ईश्वर की कृपा के बिना सच्चे ज्ञान देने वाले गुरु की प्राप्ति संभव नहीं है।

भावार्थ :
सद्गुरु का मिलना भगवान की कृपा का परिणाम है। सद्गुरु हमें सही मार्ग दिखाकर आत्मज्ञान प्रदान करते हैं, इसलिए उनका सम्मान और स्मरण हमेशा करना चाहिए।

गुरु गोविन्द कर जानिये रहिये शब्द समाय ।
मिले तो दण्डवत बन्दगी पल २ ध्यान लगाय ॥ 19 ॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु को ही परमात्मा (गोविंद) का स्वरूप समझना चाहिए और उनके बताए हुए सत्-शब्द (सच्चे ज्ञान) में सदैव लीन रहना चाहिए। जब भी गुरु का दर्शन हो, तो उन्हें दण्डवत प्रणाम करके श्रद्धापूर्वक वंदना करनी चाहिए तथा हर पल उनके उपदेशों और परमात्मा के नाम का ध्यान करना चाहिए।

भावार्थ :
मनुष्य को अपने गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और सम्मान रखना चाहिए। गुरु के ज्ञान और उपदेशों को जीवन में अपनाकर निरंतर ईश्वर का स्मरण करना ही सच्ची भक्ति है।

गुरु गोविन्द तो एक हैं दूजा सब आकार ।
आपा मेटे हरि भजै तब पावै करतार ॥ 20॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि सच्चे गुरु और परमात्मा (गोविन्द) वास्तव में एक ही हैं। संसार में दिखाई देने वाली बाकी सभी वस्तुएँ केवल नश्वर रूप और आकार हैं। जब मनुष्य अपने अहंकार, अभिमान और ‘मैं’ की भावना को मिटाकर परमात्मा का भजन करता है, तभी वह सृष्टि के रचयिता परमेश्वर (करतार) को प्राप्त कर सकता है।

संदेश:
इस साखी में कबीर साहेब ने अहंकार त्यागने, गुरु की महिमा समझने और सच्ची भक्ति के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया है।

चकवी बिछुड़ी रैन की आन मिली प्रभात।
जो जन बिछुड़े नाम से दिवस मिले न रात ॥ 21 ॥

 अर्थ :
चकवी पक्षी रात भर अपने साथी से बिछुड़ी रहती है, लेकिन सुबह होते ही उससे मिल जाती है। परंतु जो मनुष्य भगवान के नाम (स्मरण) से दूर हो जाता है, उसे न दिन में शांति मिलती है और न रात में। वह हर समय बेचैन और दुखी रहता है।

संत कबीर दास जी इस साखी के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का नाम ही सच्चा सुख और शांति प्रदान करता है। जो व्यक्ति भगवान के नाम से जुड़ा रहता है, उसका जीवन आनंदमय रहता है, जबकि नाम से दूर रहने वाला व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है।

कहना था सो कह चला अब कछु कहा न जाय।
एक आया दूजा गया दरिया लहर समाय ॥ 22 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि जो सत्य और ज्ञान मुझे कहना था, वह मैं कह चुका हूँ। अब इसके आगे कुछ भी कहने योग्य नहीं बचा है। इस संसार में जो भी आता है, उसे एक दिन जाना ही पड़ता है। जैसे नदी की लहर उठती है और फिर उसी नदी में विलीन हो जाती है, वैसे ही जीव इस संसार में आकर अंत में परमात्मा में समा जाता है।

भावार्थ:
यह साखी जीवन की नश्वरता और आत्मा के परमात्मा में विलय होने का संदेश देती है। मनुष्य को अहंकार छोड़कर सत्य और ईश्वर की भक्ति में लगना चाहिए, क्योंकि अंततः सब कुछ उसी परम सत्ता में समा जाता है।

बूडा था पर ऊबरा गुरु की लहरि चमक।
वेरा देखा झांझरा उतरि भया फरक॥ 23॥

सरल हिंदी अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि मैं अज्ञान और संसार रूपी गहरे समुद्र में डूब रहा था, लेकिन गुरु की कृपा और ज्ञान की चमक ने मुझे बचा लिया। जब मैंने अपने भीतर झाँककर सत्य को देखा, तब मेरे मन के सभी भ्रम और अज्ञान दूर हो गए। इसके बाद मैं संसार के मोह-माया से अलग होकर आत्मिक शांति और सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सका।

भावार्थ:
सद्गुरु की कृपा से मनुष्य अज्ञान, मोह और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सत्य और आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

पहिले दाता शिष्य भये तन मन अरप्यो शीश ।
पाछे दाता गुरु भये नाम दियो बखशीश ॥ 24 ॥

अर्थ:
संत कबीर साहेब कहते हैं कि पहले शिष्य ने अपना तन, मन और सिर (अर्थात् अपना सर्वस्व) गुरु को समर्पित कर दिया। जब शिष्य ने पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और समर्पण दिखाया, तब गुरु दाता बन गए और कृपा करके उसे नाम रूपी अमूल्य बख्शीश प्रदान की।

इस साखी का संदेश है कि जब साधक अहंकार छोड़कर पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ गुरु की शरण में जाता है, तब गुरु उस पर कृपा करके आध्यात्मिक ज्ञान और नामदान का अनमोल उपहार देते हैं।

Kabir Ke Dohe

राम नामके पटतरे देवे को कछु नाहिं।
क्या ले गुरु संतोषिये हवस रही मनमाहिं ॥ 25 ॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु ने मुझे राम-नाम जैसा अमूल्य खजाना दिया है, लेकिन मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं सोचता हूँ कि ऐसी कौन-सी वस्तु गुरु को अर्पित करूँ जिससे वे संतुष्ट हो जाएँ। मेरे मन में यही इच्छा बनी रहती है कि मैं अपने गुरु का ऋण कैसे चुका सकूँ।

भावार्थ:
सच्चे गुरु का उपकार इतना महान होता है कि संसार की कोई भी वस्तु उसके बराबर नहीं हो सकती। इसलिए शिष्य के मन में हमेशा गुरु के प्रति कृतज्ञता और सेवा की भावना बनी रहती है।

निज मन तो नीचा किया चरण कमलकी ठौर |
कहैं कबीर गुरुदेव बिन नजर न आवै और ॥ 26 ॥

अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि मैंने अपने मन के अहंकार और अभिमान को त्यागकर उसे गुरु के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है। अब मेरे लिए गुरु ही सब कुछ हैं। गुरुदेव के अलावा मुझे कोई अन्य दिखाई नहीं देता, क्योंकि गुरु की कृपा से ही परम सत्य और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है।

भावार्थ :
इस साखी में कबीर साहेब गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जब साधक अपना अहंकार छोड़कर पूरी श्रद्धा से गुरु की शरण में चला जाता है, तब उसकी दृष्टि में गुरु ही सर्वोपरि हो जाते हैं। गुरु ही उसे ईश्वर तक पहुँचाने वाले मार्गदर्शक होते हैं।

मन दिया तिन सब दिया मनके लार शरीर ।
अब देवेको कछु नहीं यों कथि कहे कबीर ॥ 27 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने अपना मन, प्रेम और समर्पण परमात्मा को अर्पित कर दिया, उसने मानो अपना सब कुछ दे दिया। मन के साथ शरीर भी उसी के अधीन हो जाता है। इसके बाद देने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता। इसलिए कबीर कहते हैं कि सच्चा समर्पण मन का समर्पण है, क्योंकि मन दे देने पर सब कुछ स्वतः ही अर्पित हो जाता है।

संक्षिप्त अर्थ:
जिस व्यक्ति ने अपना मन भगवान को समर्पित कर दिया, उसने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। उसके बाद देने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रहता। यही पूर्ण भक्ति और समर्पण का स्वरूप है।

तन मन दिया तो भल किया शिरका जासी भार ।
कबहूँ कहै कि मैं दिया घनी सहैगा मार ॥ 28॥

 अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि आपने अपना तन, मन और सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दिया है, तो यह बहुत अच्छा किया है क्योंकि इससे अहंकार और सांसारिक बोझ समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि समर्पण करने के बाद भी मन में यह भाव रहे कि “मैंने इतना दान किया” या “मैंने अपना सब कुछ दे दिया”, तो यह अहंकार है। ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग में अनेक कष्ट और ठोकरें खाता है।

गुरु सिकलीगर कीजिये मनहिं मस्कला देइ ।
मनका मैल छुडाइके चित दर्पण करि लेइ ॥ 29॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि हमें ऐसा गुरु बनाना चाहिए जो सिकलीगर (लोहे को घिसकर चमकाने वाला कारीगर) की तरह हमारे मन को ज्ञान और उपदेश की सान पर तेज करे। जैसे सिकलीगर लोहे का जंग और मैल हटाकर उसे चमका देता है, वैसे ही सच्चा गुरु हमारे मन के विकारों, अज्ञान और बुराइयों को दूर करके हमारे चित्त को दर्पण की तरह निर्मल और स्वच्छ बना देता है।

भावार्थ:
सच्चा गुरु मनुष्य के मन से अज्ञान और बुराइयों को दूर कर उसे पवित्र, निर्मल और ज्ञानवान बनाता है।

गुरु धोबी शिष कापडा साबुन सिरजनहार ।
सुरति शिला पर धोइये निकसै ज्योति अपार ॥ 30 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु धोबी के समान हैं और शिष्य कपड़े के समान है। परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान साबुन की तरह है। जब गुरु शिष्य के मन को ध्यान और सत्संग रूपी पत्थर पर धोते हैं, तब उसके भीतर के अज्ञान, विकार और बुराइयाँ दूर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप उसके अंदर छिपी हुई दिव्य ज्योति और आत्मज्ञान प्रकट हो जाता है।

भावार्थ:
सच्चे गुरु की शिक्षा और सत्संग से मनुष्य का जीवन निर्मल हो जाता है तथा उसके भीतर ईश्वर का प्रकाश प्रकट होने लगता है।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

Kabir Ke Dohe

गुरु कुलाल शिष्य कुम्भ हैं, गढ गढ काढै खोट ।
अन्तर हाथ सहार दै बाहर बाहे चोट ॥ 32 ॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु कुम्हार के समान होता है और शिष्य मिट्टी के घड़े के समान। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाते समय उसकी कमियों को दूर करने के लिए बाहर से थपकी देता है और अंदर से सहारा भी देता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य के दोषों और बुराइयों को दूर करने के लिए उसे अनुशासन और शिक्षा देता है। गुरु बाहर से कठोर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके हृदय में शिष्य के प्रति प्रेम, करुणा और कल्याण की भावना होती है। गुरु का उद्देश्य शिष्य को योग्य, ज्ञानवान और श्रेष्ठ मनुष्य बनाना होता है।

ज्ञान समागम प्रेम सुख दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइये सतगुरु चरण निवास ॥ 33 ॥

अर्थ:
इस दोहे का मानवीय भाव यह है कि यदि कोई मनुष्य अपने जीवन में सच्चे ज्ञान, सत्संग (समागम), निश्छल प्रेम, मन की शांति व सुख, दूसरों के प्रति दया, ईश्वर के प्रति भक्ति और अटूट विश्वास पाना चाहता है, तो उसे कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है।

ये सभी श्रेष्ठ मानवीय गुण और जीवन का परम आनंद केवल गुरु की सच्ची सेवा करने और सद्गुरु के चरणों में शरण (निवास) लेने से ही प्राप्त होते हैं।

 संदेश

यह दोहा हमें सिखाता है कि जब तक हमारे अंदर नम्रता और समर्पण का भाव नहीं होगा, तब तक हम ज्ञान या प्रेम को महसूस नहीं कर सकते। जैसे ही कोई इंसान अपने अहंकार को त्यागकर गुरु या अपने मार्गदर्शक के चरणों में समर्पित होता है, उसका जीवन दया, प्रेम, विश्वास और सच्चे सुख से भर जाता है।

गुरु मानुष करि जानते ते नर कहिये अन्ध ।
यहां दुखी संसार में आगे यम के बन्ध ॥ 34 ॥

 अर्थ:

जो मनुष्य सद्गुरु को केवल एक साधारण ‘इंसान’ या आम ‘मानव’ मानकर उनकी अवहेलना करते हैं, वे वास्तव में अज्ञानता के अंधकार में जी रहे हैं (उन्हें ज्ञान की दृष्टि से अंधा कहा गया है)। सद्गुरु केवल एक शरीर नहीं, बल्कि साक्षात ज्ञान और ईश्वर का ही स्वरूप होते हैं।

ऐसे लोग जो अपने अहंकार के कारण गुरु के ज्ञान रूपी प्रकाश को नहीं पहचान पाते, वे इस जीवन में तो दुखों और उलझनों से घिरे ही रहते हैं, और आगे चलकर भी वे अज्ञान व अपने ही कर्मों के बंधनों में फंसे रहते हैं


संदेश

यह दोहा हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्चा मार्गदर्शन और शांति पाने के लिए नम्रता और श्रद्धा का भाव सबसे आवश्यक है। जब हम गुरु में केवल एक आम इंसान का दोष खोजने लगते हैं, तो हम उनके दिए ज्ञान और प्रेम को ग्रहण नहीं कर पाते। अहंकार को त्यागकर जब एक इंसान गुरु के प्रति समर्पण का भाव रखता है, तभी उसे संसार के दुखों से मुक्ति मिलती है।

 

गुरुको मानुष जानते चरणामृत सो पानि ।
ते नर नरके जायँगे जन्म जन्म श्वानि ॥ 35 ॥

 अर्थ:

इस दोहे का मानवीय अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने गुरु को केवल एक साधारण मनुष्य मानता है और गुरु के चरणामृत को साधारण पानी (जल) समझने की भूल करता है, वह भावहीन और विवेकहीन है।

कबीर दास जी कहते हैं कि ऐसी श्रद्धाहीन और अज्ञानी सोच रखने वाले मनुष्य नर्क के भागी बनते हैं और उन्हें बार-बार नीच योनियों में (जैसे कुत्ते यानी श्वानि के रूप में) जन्म लेकर भटकना पड़ता है।
 
संदेश

यह दोहा हमें सिखाता है कि भावना ही सब कुछ है। यदि हमारे मन में गुरु के प्रति केवल एक साधारण इंसान का भाव होगा, तो उनके दिए ज्ञान का असर हमारे जीवन पर कभी नहीं होगा। गुरु जल को नहीं, बल्कि उस भाव और कृपा को सींचते हैं जो शिष्य के जीवन का उद्धार करती है। श्रद्धा और भाव के बिना कोई भी साधना या ज्ञान अधूरा है।

Kabir Ke Dohe

सुखिया सब संसार है खाये और सोए।
दुखिया दास कबीर है जागे और रोए  ॥36॥

अर्थ:

कबीर जी कहते हैं कि यह पूरा संसार एक अजीब से भ्रम में मग्न है। लोग खाने-पीने और सोने (भोग-विलास और मोह-माया) में ही मग्न हैं और इसी को सच्चा ‘सुख’ समझकर खुश हो रहे हैं। वे इस बात से बेखबर हैं कि यह जीवन क्षणभंगुर है और वे ईश्वर से दूर हैं।

दूसरी ओर, कबीर (सच्चा भक्त या जागरूक इंसान) दुखी हैं, क्योंकि वे संसार की इस अज्ञानता और ईश्वर से दूरी को देख रहे हैं। वे मोह-माया की नींद से जाग चुके हैं और संसार की इस दुर्दशा तथा प्रभु-मिलन की तड़प में रात-दिन रो रहे हैं।

 संदेश

यह दोहा हमें इंसान के मन की दो अलग-अलग अवस्थाओं को दिखाता है:

  • अज्ञानता का सुख: जब तक इंसान ईश्वर, सत्य और अपने जीवन के असली मकसद से अनजान रहता है, वह सांसारिक चीजों में ही खुश रहता है।

  • संवेदनशीलता और ज्ञान का दुख: जब इंसान के अंदर ज्ञान और संवेदनशीलता जागती है, तो उसे अहसास होता है कि लोग व्यर्थ की चीज़ों में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। सच्चा इंसान केवल अपने लिए नहीं जीता, बल्कि दूसरों की अज्ञानता और संसार के कष्टों को देखकर उसका हृदय भर आता है।

गुरु हैं बडे गोविन्द ते मनमें देख विचार |
हरि सुमरै सो वार है गुरु सुमरे सो पार ॥ 37 ॥

 अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि अपने मन में थोड़ा विचार और चिंतन करके देखो, तो तुम्हें समझ आएगा कि गुरु का स्थान ईश्वर (गोविन्द) से भी बड़ा और श्रेष्ठ है।

इसका कारण यह है कि केवल ‘हरि’ (ईश्वर) का नाम स्मरण करने वाला व्यक्ति तो संसार सागर के ‘इसी पार’ (मोह-माया, दुखों और भ्रम में) ही अटका रह जाता है, क्योंकि उसे ईश्वर तक पहुँचने का सही मार्ग ही नहीं पता होता। लेकिन जो व्यक्ति गुरु का स्मरण करता है और उनके बताए रास्ते पर चलता है, गुरु उसे इस भवसागर से ‘पार’ लगा देते हैं और ईश्वर से मिला देते हैं।

 संदेश

यह दोहा एक मनुष्य के जीवन में मार्गदर्शक (गुरु) की अहमियत को रेखांकित करता है:

  • रास्ता दिखाने वाला ही बड़ा होता है: ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं, लेकिन एक आम इंसान अपनी अज्ञानता के कारण उन्हें पहचान नहीं पाता। गुरु ही वह पहला इंसान होता है जो हमारी आँखों से अज्ञान का पर्दा हटाकर ईश्वर और सत्य का दर्शन कराता है।

  • समर्पण का भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में सही दिशा और ज्ञान देने वाले गुरु के प्रति हमेशा कृतज्ञता और सर्वोच्च सम्मान का भाव होना चाहिए।

गुरु सीढ़ी ते ऊतरै शब्द बिहूना होय।
ताको काल घसीटि हैं राखि सकै नहिं कोय || 38 ||

अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति ऊँचाई पर पहुँचने के बाद सीढ़ी से नीचे उतर जाए, ठीक उसी प्रकार जो मनुष्य गुरु द्वारा दी गई आध्यात्मिक प्रगति की ‘सीढ़ी’ (मार्ग और साधना) को छोड़ देता है और गुरु के ‘शब्द’ (ज्ञान, उपदेश या गुरु-मंत्र) से विहीन (दूर) हो जाता है, उसकी स्थिति बेहद दयनीय हो जाती है।

ऐसा दिशाहीन व्यक्ति अंततः काल (समय, दुख, मृत्यु और मोह-माया के चक्र) का शिकार बन जाता है। उसे सांसारिक कष्टों और काल के पंजों से फिर कोई नहीं बचा सकता, क्योंकि उसने स्वयं उस एकमात्र सहारे (गुरु-कृपा) को छोड़ दिया है जो उसे बचा सकता था।

संदेश

यह दोहा इंसान के जीवन में निरंतरता और अनुशासन के भाव को उजागर करता है:

  • भटकने का परिणाम: जब तक इंसान किसी सही मार्गदर्शक और उनके बताए विचारों से जुड़ा रहता है, वह जीवन के दुखों से सुरक्षित रहता है। लेकिन जैसे ही अहंकार या लापरवाही के कारण वह उस ज्ञान के रास्ते से नीचे उतरता है, संसार के कष्ट उसे घेर लेते हैं।

  • संभाले रखने वाला भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में सही मूल्यों और ज्ञान से जुड़े रहना कितना ज़रूरी है, वरना इंसान वक्त की मार और दुखों के थपेड़ों के आगे बिल्कुल असहाय हो जाता है।

अहम अग्नि निशि दिन जरे गुरु सोचा है मान ।
ताको यम नेवता दियो होहु हमार मेहमान ॥ 39 ॥

अर्थ

इस दोहे का मानवीय अर्थ यह है कि जो मनुष्य अहंकार की आग में दिन-रात जलता रहता है और अपने गुरु को एक साधारण ‘मानव (इंसान)’ समझने की भूल करता है, वह जीवन के सबसे बड़े सत्य से दूर हो जाता है।

कबीर जी कहते हैं कि ऐसे अहंकारी और भावनाहीन व्यक्ति को अंततः यमराज (काल/मृत्यु) स्वयं न्योता (निमंत्रण) भेजते हैं कि— “आओ, अब तुम हमारे मेहमान बनो और अपने कर्मों व अहंकार का फल भुगतो।”

 संदेश

यह दोहा मनुष्य के अंदर पल रहे अहंकार की भयंकरता को दर्शाता है:

  • अहंकार इंसान को जलाता है: जब इंसान के अंदर ‘मैं’ (अहम) का भाव आ जाता है, तो वह दिन-रात ईर्ष्या, घमंड और अशांति की आग में खुद ही जलता रहता है।

  • सम्मान और विनम्रता का अभाव: जब अहंकार आ जाता है, तो इंसान को अपने गुरु या सच्चे मार्गदर्शक में भी कमियाँ ही नज़र आती हैं और वह उन्हें साधारण इंसान समझकर उनकी बात को अनसुना कर देता है।

  • परिणाम: जो व्यक्ति ज्ञान और नम्रता को ठुकरा देता है, अंत में दुखों, कष्टों और यम के भय को सहने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं बचता।

गुरु पारस गुरु परस है चन्दन बास सुबास |
सतगुरु पारस जीवको दीना मुक्ति निवास ॥ 40 ॥

अर्थ

इस दोहे का अर्थ यह है कि गुरु स्वयं ‘पारस’ पत्थर के समान हैं और उनका स्पर्श (ज्ञान) भी पारस जैसा चमत्कारिक है।

जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है और चंदन के पास रहने वाले साधारण पेड़-पौधे भी चंदन की सुगंध (सुबास) से महक उठते हैं, ठीक उसी प्रकार सतगुरु रूपी पारस जब किसी साधारण जीव (मनुष्य) को अपना ज्ञान और स्पर्श देते हैं, तो वे उसके भीतर के अज्ञान और बुराइयों को मिटाकर उसे ‘मुक्ति’ (परम शांति और ईश्वर-धाम) का अधिकारी बना देते हैं।

संदेश

यह दोहा एक मनुष्य के जीवन में सत्संग और सही संगति के प्रभाव को गहराई से दर्शाता है:

  • बदलाव का भाव: एक आम इंसान गलत संगति, अज्ञान और मोह-माया में उलझकर लोहे की तरह कठोर या बेजान हो जाता है। लेकिन जैसे ही वह गुरु के संपर्क में आता है, उसका पूरा व्यक्तित्व सोने की तरह खरा और चंदन की तरह परोपकारी बन जाता है।

  • उद्धार की भावना: गुरु इंसान के भीतर की छिपी हुई अच्छाइयों को जगा देते हैं। यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्चे मार्गदर्शक के सानिध्य में आते ही इंसान सांसारिक बंधनों और मानसिक तनावों से मुक्त होकर परम आनंद को प्राप्त कर लेता है।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

गुरु सो भेद जो लीजिये शीश दीजिये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये गखि जीव अभिमान ॥ 41 ॥

अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि यदि तुम्हें गुरु से ईश्वर, सत्य और जीवन का गूढ़ ‘भेद’ (परम ज्ञान) प्राप्त करना है, तो तुम्हें अपना ‘शीश दान’ में देना होगा। (यहाँ ‘शीश दान’ का अर्थ अपना सिर काटना नहीं, बल्कि अपने अहंकार, घमंड और ‘मैं’ की भावना को गुरु के चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देना है।)

दूसरी ओर, जो लोग अपने अंदर ‘मैं’ का अभिमान और घमंड बचाकर रखते हैं, ऐसे बहुत से मूर्ख (भोंदू) संसार-रूपी नदी के तेज़ बहाव में बह गए (नष्ट हो गए) और कभी भी सत्य व मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सके।

संदेश

यह दोहा मनुष्य के मन के समर्पण और अहंकार के बीच के द्वंद्व को उजागर करता है:

  • सच्ची पात्रता: ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंसान को बर्तन की तरह खाली (नम्र) होना पड़ता है। जब तक इंसान के मन में अपना ज्ञान, पद या रूप का घमंड भरा रहेगा, तब तक गुरु का ज्ञान उसके अंदर समा ही नहीं सकता।

  • अहंकार ही विनाश का कारण है: जो इंसान यह सोचता है कि “मैं ही सब कुछ जानता हूँ” या जो गुरु के सामने भी अपने अहंकार को नहीं त्याग पाता, वह जीवन के असली मकसद से भटक जाता है और सांसारिक दुखों के बहाव में डूब जाता है।

जब मै था तब हरी नहीं अब हरी है मै नाहीं।
सब अधियारा मिट गया जब दीपक देखा माहि ॥ 42 ॥

 अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि जब तक मेरे भीतर ‘मैं’ (अहंकार, घमंड और अज्ञान) का भाव मौजूद था, तब तक मुझे ‘हरि’ (ईश्वर/परम सत्य) की अनुभूति नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही गुरु की कृपा से मेरे अंदर का अहंकार समाप्त हुआ, मुझे अपने भीतर ही ईश्वर का दर्शन हो गया—अब केवल ईश्वर हैं, मेरी ‘मैं’ का कोई अस्तित्व नहीं बचा।

जिस प्रकार एक दीपक के जलते ही कमरे का सारा अंधेरा गायब हो जाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे ही मैंने अपने मन के भीतर ज्ञान रूपी दीपक को देखा, मेरे अज्ञान और मोह-माया का सारा अंधेरा हमेशा के लिए मिट गया।

 संदेश

यह दोहा इंसान की आत्म-खोज और आंतरिक बदलाव के भाव को दर्शाता है:

  • अहंकार ही सबसे बड़ी दीवार है: जब तक इंसान “मैं बड़ा हूँ”, “मेरा पद”, या “मेरी सोच” में अटका रहता है, तब तक वह प्रेम, शांति और ईश्वर से दूर रहता है। ईश्वर और अहंकार कभी एक जगह नहीं रह सकते।

  • अंदर का उजाला: इंसान शांति और सत्य को बाहर की दुनिया में खोजता रहता है, जबकि ज्ञान का असली दीपक उसके अपने मन के भीतर ही जल रहा होता है। जैसे ही इंसान नम्र होकर अपने भीतर झांकता है, जीवन का सारा भ्रम और अंधकार खत्म हो जाता है।

कबीर साहेब कहते है – जब मुझ में हम रूपी अहंकार था , तब हरी ( परमत्मा ) मुझ से दूर थे , जब अहंकार को छोड़ा तब हरी मिले , और सब अज्ञानता मिट गया जब अंदर में ज्ञान रूपी प्रकाश को देखा।

गुरु बतावै साधु को साधु कहै गुरु पूज ।
अरस-परस के खेल में भई अगम की सूज ॥ 43 ॥

अर्थ

इस दोहे का मानवीय और आध्यात्मिक अर्थ यह है कि गुरु अपने शिष्य (साधु) की महानता को बताते हैं और शिष्य अपने गुरु की पूजा व आदर करता है।

दोनों के बीच किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं है; बल्कि एक-दूसरे के प्रति असीम प्रेम, सम्मान और परस्पर समर्पण (अरस-परस) का भाव है। इस पावन और सुंदर संबंध के प्रभाव से ही इंसान को उस ‘अगम’ (जहाँ पहुँचना कठिन हो, यानी परम सत्य या ईश्वर) की ‘सूज’ (सच्ची समझ और साक्षात्कार) प्राप्त हो जाती है।

 संदेश

यह दोहा दो आत्माओं के बीच अहंकार-रहित प्रेम और सम्मान के भाव को दर्शाता है:

  • आपसी सम्मान का भाव: सच्चा गुरु कभी शिष्य पर अपना प्रभुत्व नहीं जमाता, बल्कि उसकी साधना का सम्मान करता है। इसी तरह, सच्चा शिष्य गुरु के प्रति कृतज्ञ रहता है। जब दो मनुष्यों के बीच से ‘मैं’ और ‘तू’ का फर्क खत्म होकर केवल आदर बचता है, तो वही सच्चा संबंध बनता है।

  • परम सत्य की प्राप्ति: जहाँ गुरु और शिष्य के बीच व्यापार या दिखावा नहीं, बल्कि निष्काम प्रेम और एक-दूसरे के प्रति आदर का ‘खेल’ (भाव) होता है, वहीं इंसान को जीवन के सबसे बड़े और गूढ़ सत्य का ज्ञान हो जाता है।

यम गरजे बल बाघके कहै कबीर पुकार।
गुरू कृपा ना होत जो तौ यम खाता फार ॥ 44 ॥

 अर्थ
कबीर दास जी पुकार-पुकार कर (ज़ोर देकर) कहते हैं कि यह ‘यम’ (काल, मृत्यु और जीवन की विकट परिस्थितियाँ) किसी भूखे और शक्तिशाली बाघ की तरह दहाड़ता हुआ इंसान पर हमला करने आता है।

यदि मनुष्य के सिर पर गुरु की असीम कृपा और आशीर्वाद की छत्रछाया न होती, तो यह यम (दुख और काल) इंसान को अपने पंजों में दबोचकर चीढ़-फाड़कर खा जाता और उसका पूरी तरह विनाश कर देता। यह केवल गुरु का रक्षा-कवच है जो इंसान को इन भयंकर कष्टों से बचाकर सुरक्षित रखता है।

 संदेश

यह दोहा एक असहाय इंसान के मन में भय और आश्रय (सुरक्षा) के भाव को उजागर करता है:

  • इंसान की विवशता: जीवन में कई बार ऐसी कठिन और भयानक परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ इंसान खुद को शेर/बाघ के सामने घिरे हिरण की तरह अकेला और कमज़ोर महसूस करता है।

  • गुरु की शरण का भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि जब इंसान अपनी सामर्थ्य हार बैठता है, तब गुरु का ज्ञान, मार्गदर्शन और कृपा ही उसे भयमुक्त करती है। जैसे एक बच्चा माता-पिता के पीछे छिपकर निडर हो जाता है, वैसे ही गुरु का सच्चा शिष्य जीवन के बड़े से बड़े संकट और काल के भय से बेफिक्र हो जाता है।

अवर्ण वरण अमूर्ति जो कहौं ताहि किन पेख ।
गुरू दयाते पावई सुरति निरति करि देख ॥ 45 ॥

 अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि वह परमात्मा ‘अवर्ण’ (जिसका कोई रंग या जाति नहीं है), ‘वरण’ (जो सब रंगों और रूपों में समाया है) और ‘अमूर्ति’ (जिसका कोई आकार या मूर्ति नहीं है) है। ऐसे अप्रत्यक्ष ईश्वर को भला कोई अपनी इन साधारण आँखों से कैसे देख (पेख) सकता है?

उसे बाहरी आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन गुरु की असीम दया और कृपा से उसे पाया जा सकता है। इसके लिए इंसान को अपनी ‘सुरति’ (मन का ध्यान/याद) और ‘निरति’ (सांसारिक तृष्णाओं से विरक्ति/आंतरिक दृष्टि) को एक करके अपने मन के भीतर देखना होगा।

 संदेश

यह दोहा एक मनुष्य की आंतरिक खोज और समर्पण के भाव को व्यक्त करता है:

  • निराकार की अनुभूति: इंसान अक्सर ईश्वर को बाहर किसी आकार या मूर्ति में तलाशता है, जबकि सत्य तो सर्वव्यापी और निराकार है। साधारण बुद्धि से उसे समझ पाना असंभव है।

  • ध्यान और विरक्ति की आवश्यकता: केवल मुँह से नाम लेने से ईश्वर नहीं मिलते। जब इंसान संसार के प्रपंचों से अपना ध्यान हटाकर (निरति) पूरी एकाग्रता से अपने भीतर झांकता है (सुरति), तभी उसे परम सत्य का अहसास होता है।

  • गुरु की कृपा का भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि अंतरात्मा के इस सूक्ष्म मार्ग पर चलने का सही तरीका केवल और केवल गुरु के मार्गदर्शन और दया से ही प्राप्त होता है।

 

यह धन जो गुरुकी अहै भाग बडे जिन पाय ।
कह कबीर टोटा नहीं जब परे तबहि लखाय ॥46॥

 अर्थ

कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु से प्राप्त ज्ञान, नाम और राम-रूपी धन अत्यंत दिव्य और अमूल्य है। यह धन केवल उन्हीं मनुष्यों को मिलता है, जिनके बड़े भाग्य (पुण्य) होते हैं।

इस आध्यात्मिक धन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कभी कोई ‘टोटा’ (घाटा या कमी) नहीं आता—यह खर्च करने से और बढ़ता ही है। जब मनुष्य के जीवन में कोई कठिन समय, विपत्ति या संकट (‘जब परे’) आता है, तभी उसे इस गुरु-ज्ञान रूपी धन की सच्ची कीमत और सामर्थ्य (‘लखाय’) का अहसास होता है।

 संदेश

यह दोहा एक मनुष्य के जीवन में धैर्य, संबल और आत्म-बल के भाव को उजागर करता है:

  • असली धन की पहचान: दुनिया का भौतिक धन (पैसा, ज़मीन) संकट के समय साथ छोड़ सकता है या खत्म हो सकता है, लेकिन गुरु का दिया ज्ञान और संस्कार कभी खत्म नहीं होते।
  • मुसीबत में ही परख: जब इंसान जीवन में हताश, निराश या किसी बड़े संकट में घिर जाता है, तब गुरु की सिखाई बातें और उनका दिया आध्यात्मिक बल ही इंसान को टूटने से बचाता है और सही राह दिखाता है।
  • कृतज्ञता का भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि जिन्हें जीवन में सच्चा गुरु और उनका ज्ञान मिला है, वे संसार के सबसे धनी और भाग्यशाली इंसान हैं।

कह कवीर दरगाह सो जेहि उतरी है भार ।
सोइ करै गुरुआइया झकि २ मरे गँवार ॥ 47 ॥

अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि ईश्वर की ‘दरगाह’ (परम सत्य के द्वार) में केवल वही व्यक्ति गुरु बनने के योग्य माना जाता है, जिसने अपने और अपने शिष्यों के अज्ञान, पाप, मोह और अहंकार रूपी ‘भार’ (बोझ) को पूरी तरह उतार दिया है।

केवल ऐसा मुक्त पुरुष ही दूसरों का मार्गदर्शन या ‘गुरुआई’ (गुरुपद/गुरु का काम) करने का अधिकारी है। इसके विपरीत, जो लोग खुद अज्ञानी हैं और जिनके सिर पर सांसारिक वासनाओं का बोझ बना हुआ है, वे ‘गँवार’ (मूर्ख) यदि गुरु बनने का ढोंग करते हैं, तो वे व्यर्थ में ही झक मार-मारकर (भटक-भटककर और दुखी होकर) नष्ट हो जाते हैं और दूसरों को भी डुबो देते हैं।

 संदेश

यह दोहा इंसान की सच्ची योग्यता और पाखंड के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है:

  • जिम्मेदारी का भाव: गुरु बनना कोई पदवी या दिखावे का खेल नहीं है, बल्कि एक भारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी है। जो खुद संसार के दुखों और विकारों के नीचे दबा है, वह किसी दूसरे का सहारा कैसे बन सकता है?

  • आत्म-शुद्धि की आवश्यकता: यह दोहा हमें सिखाता है कि दूसरों को ज्ञान बाँटने या उनका मार्गदर्शक बनने से पहले इंसान को खुद के भीतर के अहंकार और अज्ञान के बोझ को उतारना आवश्यक है। बिना योग्यता के बड़ा बनने का प्रयास इंसान को केवल दुखी और अपमानित ही करता है

पंडित पढि गुनि पचि मुये गुरु बिन मिलै न ज्ञान ।
ज्ञान बिना नहि मुक्ति है सत्य शब्द प्रमान ॥ 48 ॥

 अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि बड़े-बड़े विद्वान और पंडित शास्त्रों को पढ़-पढ़कर, उनका चिंतन करके और बहस-मुबाहसे में पच-पचकर (खुद को थकाकर) मिट गए, लेकिन बिना सच्चे गुरु के किसी को भी वास्तविक और अनुभवजन्य ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई।

और यह अटल सत्य है (जिसका प्रमाण स्वयं ‘सत्य शब्द’ यानी गुरु का उपदेश है) कि बिना सच्चे ज्ञान के मनुष्य को सांसारिक दुखों, बंधनों और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति नहीं मिल सकती।

 संदेश

यह दोहा एक मनुष्य के मन की व्यर्थ की खोज और सच्चे बोध के भाव को उजागर करता है:

  • किताबी ज्ञान का भ्रम: इंसान अक्सर सोचता है कि केवल पोथियाँ पढ़ लेने या बातें सीख लेने से वह ज्ञानी बन गया है। लेकिन जब तक जीवन में गुरु का मार्गदर्शन नहीं होता, वह ज्ञान केवल बुद्धि का बोझ (अहंकार) बनकर रह जाता है, उससे मन की शांति नहीं मिलती।

  • अनुभव और दिशा की आवश्यकता: यह दोहा हमें सिखाता है कि जीवन में सही दिशा दिखाने वाला गुरु ही इंसान के अज्ञान का पर्दा हटाता है। जब इंसान को गुरु के माध्यम से सत्य का बोध होता है, तभी वह अपने भीतर की उलझनों और दुखों से मुक्त हो पाता है।

मूल ध्यान गुरु रूप है मूल पूजा गुरु पाव।
मृलनाम गुरु बचनहै सत्य मूल सत भाव॥ 49॥

 अर्थ

कबीर जी कहते हैं कि यदि तुम्हें जीवन में ईश्वर या परम शांति की साधना करनी है, तो उसके मूल आधार को समझो:

  1. मूल ध्यान: ध्यान का सबसे मुख्य और सरल रूप गुरु के स्वरूप (रूप) को अपने मन में बसाना है।

  2. मूल पूजा: सबसे श्रेष्ठ पूजा गुरु के चरणों (पाव) में अपने अहंकार को समर्पित कर देना है।

  3. मूल नाम: जपने योग्य सबसे सच्चा ‘नाम’ गुरु के दिए गए वचन (मंत्र या ज्ञान) का पालन करना है।

  4. मूल सत्य: और इन सभी साधनाओं की सबसे सच्ची जड़ ‘सत भाव’ यानी मन में गुरु और ईश्वर के प्रति निष्छल, पवित्र और सच्चा भाव (श्रद्धा) रखना है।

संदेश

यह दोहा एक मनुष्य के मन के सरल समर्पण और भक्ति भाव को दर्शाता है:

  • साधना को सरल बनाना: इंसान अक्सर ईश्वर को पाने के लिए कठिन जपों, अनुष्ठानों और कर्मकांडों में उलझ जाता है। यह दोहा सिखाता है कि अगर मन में सच्चा भाव नहीं है, तो सब व्यर्थ है।

  • सच्चा भाव ही सब कुछ है: गुरु के वचनों को जीवन में उतारना और उनके प्रति सच्चा भाव (श्रद्धा व नम्रता) रखना ही इंसान को हर भटकाव से बचाकर ईश्वर तक ले जाता है। जब तक इंसान का भाव पवित्र नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा-पाठ पूरा नहीं हो सकता।

कबीर साहेब कहते है – वास्तविक ध्यान गुरु का स्वरुप है जो अभ्यास के समय अंदर में देखा जाये , वास्तविक पूजा गुरु चरण है , वास्तविक नाम गुरु के बचन है जो नाम गुरु ने बताया उसी से उधार होगा , सच्चे लगन से गुरु भक्ति यही मुक्ति का आधार है।

जीवन यौवन राजमद अविचल रहा न कोई।
जा दिन जाये सत्संग में जीवन का फल सोए॥ 50॥

 अर्थ

इस दोहे का मानवीय अर्थ यह है कि मनुष्य का यह जीवन, उसकी जवानी (यौवन), और सत्ता व धन का घमंड (राजमद)—इनमें से कोई भी चीज़ हमेशा रहने वाली नहीं है। यह सब कुछ समय के साथ ढल जाता है और नष्ट हो जाता है।

इसलिए, इंसान अपने पूरे जीवन में चाहे जितने भी भौतिक सुख और धन-दौलत कमा ले, लेकिन उसके जीवन का सच्चा ‘फल’ (सार्थक परिणाम) केवल वही दिन है, जो दिन उसका सत्संग (सच्चे मार्गदर्शकों की संगति, अच्छे विचारों और ईश्वर के ध्यान) में व्यतीत होता है।

 संदेश

यह दोहा इंसान को जीवन के असली मकसद और नश्वरता का अहसास कराता है:

  • भ्रम और सच्चाई: इंसान अक्सर अपनी जवानी, सुंदरता, पद और पैसे के अहंकार में डूबा रहता है और सोचता है कि यह सब हमेशा रहेगा। लेकिन वक्त की मार के आगे ये चीज़ें टिक नहीं पातीं।

  • सच्ची सार्थकता: जब इंसान सत्संग से जुड़ता है, तो उसका मन शांत होता है और उसे सही-गलत की पहचान होती है। यह दोहा हमें सिखाता है कि जो दिन हमने अच्छी संगति और नेक विचारों में बिताया, वही हमारे जीवन का सबसे अनमोल और सार्थक दिन होता है।

 

 

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