बावन जंजीरा कसनी जो सद्गुरु कबीर साहेब के ऊपर सिकन्दर के द्वारा कराया गया था। जो 52 प्रकार के यातनाएँ दिए गए थे। सद्गुरु कबीर साहेब ने इन्ही बावन जंजीरा से उन यातनाओं का निवारण किये। उन्ही बावन जंजीरा मंत्र का यहाँ विवरण दिया जा रहा है।
कबीर साहेब के बावन जंजीरा (52 जंजीरा) मंत्र, पारंपरिक पाठ, ध्यान और विधि के बारे में विस्तार से जानें। यह सामग्री उपलब्ध प्राचीन पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत की गई है।
बावन जंजीरा
बावन जंजीरा का परिचय
कबीर साहित्य में बावन जंजीरा अपना एक अलग ही महत्व रखता है। बावन जंजीरा का संबंध बावन कसनी है। दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी के गुरू शेखतकी ने सद्गुरू कबीर साहेब के बढ़ते प्रभाव से चिढ़कर बादशाह से झूठी शिकायतें की। शेखतकी बादशाह के गुरू थे और बादशाह के पास शक्ति थी।
कबीर साहेब और बावन कसनी
अतः अपने प्रभुत्व (गुरूत्व) का अनुचित प्रयोग कर शेखतकी सद्गुरु कबीर साहेब को बहुत प्रकार से प्रताड़ित करने लगे। वे गिनती में बावन बतायी जाती है। सद्गुरू जिन उपायों (मंत्रो) से उन परीक्षा रूपी कसनी (जंजीर) को तोड़ते गये, वे ही बावन जंजीरा के नाम से विख्यात है। जंजीरा अर्थात जंजीर, श्रृंखला, बंधन।
कोई भी कार्य बिना तपश्चर्या, लगन और समर्पण से सिद्ध नहीं होता है। मन में अनन्त शक्तियाँ निहित है। मन की शक्तियों को प्रगट करने के लिए आवश्यक है कि हमारा मन एकाग्र हो। जब मन एकाग्र हो जाय तो जो भी कार्य किया जाता है उसमें शीघ्र सफलता प्राप्त होती है। मन की शक्ति के ह्रास के प्रमुख द्वार है: हमारी पंच ज्ञानेन्द्रियाँ। यदि इन्हें यूं ही अनियंत्रित खुला छोड़ दिया जाय तो मन निर्बल हो जाता है।
मन ताकतवर न होने से लगन और निष्ठा कमजोर हो जाती है जिससे किसी भी कार्य में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती। जैसे बाढ़ के द्वारा लाई गई मिट्टी को हटाने के लिए पानी का प्रेसर काम में लाया जाता है। इसके लिए पाइप का मुँह संकरा रखा जाता है ताकि पानी वेग के साथ निकले। किन्तु यदि पाइप में जगह-जगह छिद्र हों तो वेग कमजोर होगा। ऐसे ही सूर्य की बिखरी किरणों को जब विशेष काँच के द्वारा एक बिन्दू से पार करायी जाती है तो केन्द्रित किरणों के तेज से नीचे रखा गया कागज जल जाता है।
इसी प्रकार मन के अन्य रास्ते बंद करके उसे किसी एक कार्य में केन्द्रित किया जाये तो कार्य में शीघ्र सफलता मिलती है। यही साधना का मतलब है। साधना का अर्थ है मन को शक्तिशाली बनाकर उनकी सुप्त शक्तियों को जागृत करना।
बावन जंजीरा के मंत्रो को नियम और विधिपूर्वक सिद्ध किया जाय तो उसका बड़ा लाभ देखने को मिला है। सद्गुरू ने इन मंत्रो से बावन कसनी रूप जंजीरा को तोड़ा था। ये मंत्र आज भी उतने ही प्रभावशाली हैं, बशर्ते साधक किसी समर्थ गुरू के मार्गदर्शन में तथा शुद्धआचरण, पवित्र मन और निष्ठापूर्वक साधना करें। परहित की भावना से यदि सिद्ध किये मंत्रों को व्यहृत किया जाये तो निःसन्देह फलित होता है।
आचार्यपीठ खरसिया के पूर्व आचार्य श्री हजूर उदितनाम साहेब समर्थ और सिद्धपुरूष थे। उनके आर्शीवाद प्राप्त बहुत से भक्त उन्हें एक सिद्ध महापुरूष के रूप में स्मरण करते हैं। दिल्ली, राजस्थान, बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में बहुत से ऐसे भक्त हैं, जिनके जीवन में उनका आर्शीवचन फलित हुआ। उनकी लहरतारा स्मारक (वाराणसी) स्थित समाधि सिद्ध भूमि है।
बहुत से भक्त एवं साधु समाधि स्थल में जप-तप-ध्यान करके सिद्धि प्राप्त किये हैं। उनकी पुण्यतिथि पौष शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर यह ‘बावन जंजीरा’ पुस्तक प्रकाशित की जा रही है। इस कार्य में उनसे उनके आर्शीवाद की कामना करते हैं।
सत्सुकृत आदि अदली अजर अमर अचिंत पुरुष मुनीन्द्र करुणामय कबीर सुरतियोग संतायन चार गुरु धनी धर्मदास वंश बयालिस की दया
इन शुभ मासों में से कोई मास हो उस मास में जब पूर्णिमा या चतुर्दशी
सोमवार, बुधवार, गुरुवार अथवा शुक्रवार की हो सिद्ध करें।
यह सद्गुरु का पाठ या व्रत पूर्णिमा ही को होता है।
परन्तु पूर्णिमा जब ३० दण्ड से कम रहे तब चतुर्दशी को ही शुरु करें।
सिद्ध इस प्रकार करें कि पूर्णिमा या चतुर्दशी जिस दिन उपरोक्त
शुभ दिनों में से कोई दिन हो उस दिन व्रत करे, फलाहार करें।
जाप का स्थान एकान्त हो किसी प्रकार हल्ला-गुल्ला न हो।
जिस स्थान में पाठ करने के लिए निश्चित किये हों, उस स्थान को
श्वेत मिट्टी तथा नये वस्त्र से लीप कर पवित्र करें। चन्दन और इत्र छिड़क दें, श्वेत सुगन्धित फूलों में जैसे- चम्पा, चमेली, बेली, मोगरा इत्यादि जो प्राप्त हो सकें. लावें ।
तीन घंटा या सवा पहर रात्रि व्यतीत होने पर जाप आरम्भ करें।
जाप इस प्रकार करें, जहाँ जाप करने का स्थान निश्चित किये हों उपरोक्त
विधि से लीप-पोत कर पवित्र किये हुए स्थान में चावलों के आटा से चौका पूरें,
कलशा में शुद्ध जल भरकर उसमें पैसा, कसेली डाल दें तब कलशा के मुँह पर
आम के पाँच पत्तें धरें, और उसपर गौ घृत से दीपक जलायें अर्थात् कबीरपंथी महन्त साहब जिस प्रकार से चौका आरती के समय चौका पूरते हैं उसी प्रकार चौका पूर कर कलश आदि रखकर यह कार्य सम्पन्न करें।
प्रसाद के वास्ते-पान, पेड़ा, केला, शक्कर, छुहारा, नारियल, सुपारी, बादाम, लोंग, इलायची इत्यादि सवा पवा भोग मे रखें और धूप के लिये देवदारु, श्वेतचन्दन, कपूर, घी में मिलाकर आम की लकड़ी की अग्नि पर हुमाध देवें (धूप देवें)। तुलसी या श्वेत चन्दन
कबीर जंजीरा बावन कसनी की माला से जाप करें। श्वेत वस्त्र का आसन रखें, पूरब या उत्तर मुख होकर जाप करें। नित्य १०८ बार जाप करें, जाप करने से पहले सद्गुरु का ध्यान कर लें, ध्यान इस श्लोक को पढ़कर करें-
जो कोई आवे मारे करन्ता तेली के लटा परन्ता कलाल के भट्ठी परन्ता सार देश के आदमी प्रदेश परदेश का आदमी सार देश कबीर दाना केता खाय सवा सेर तो खाय अस्सी कोस चलावे बन्द बाँध बार सोलह कला को बाँध छप्पन सो वीर बाँध आठ कोट भैरों बाँध संखनी बाँध डाकिनी बाँध लाव लुता बाँध देव बाँध भूत बाँध चोर बाँध चोरट बाँध दीठ बाँध मूठ बाँध टोना बाँध नीन बाँध तप-तिजारी बाँध एतना सुनके न बाँध तो तेरी माँ के दूध हराम तीसरा रोज ही न गुरु कबीर शिर पर खड़े तब सब सन्तन के सरदार अजर नाम के रक्षा अजर पुरुष
अस्थिर मते चलु कबीर के निर्मल भया शरीर सत्तपुरुष की चौकी सत सुकृत है साथ सत्कबीर अजर शब्द है मैटो सकल विषाद वज्र जंजीरा मरही का सत सुकृत जंजीरा वज जंजीरा दक्षिण देवी नो बहिन को बाँध घाट बाट मरी मसान को बाँध ब्रह्मा विष्णु महेश को बाँध ई अकार बाँध भैरो वीर बजरंग को बाँध अग्नि मुख आवें तो अग्नि को बाँध जल मुख आवे तो जल को बाँध पवन मुख आवे तो पवन को बाँध पृथ्वी मुख आवे तो पृथ्वी को बाँध पाँच तत्त्व पंचभूत आत्मा को बाँध सुरति निरती को बाँध इतना वज्र जंजीरा सुन के जो न आन करे तो सतसुकृत की दोहाई ।
विधि
इस विधि जंजीरा से तीन बार पढ़कर धूली उड़ा दें तो गाँव-ठाँव सब बंध जाय मार्ग में चलते चोर डाकू सर्प आदि सब बन्ध जावे ।
वज्र जंजीरा वज्र के धार । साधु संत के हैं रखवार ।।
जहँ लग शब्द चले चौधारा। बाँधी घेरी चौखण्ड वारा ।।
बाँधो ठोकर ठाटर वार। बाँधो लोह अग्नि की डार ।।
बाँधो चार चुगुल बँटपारा। बाँधो दूती बोल बाँधो मीर ।।
चुक जो सुने ना श्रवण खोल खूनी का खून बाँधो गुलाम का आब बाँधो छूरी का धार बाँधो मूठ कटार बाँधो जम्बू वर बार बाँधो जम्बू धर धार बाँधो आवती परी बाँधो विष का वीरा बाँधो कमान को तीर बाँधो तुपक की गोली बाँधो कुहकना बान बाँधो आकाश की बिजुली बाँधो अष्टकुली नाग बाँधो वीर अवीर बाँधो अपनी काया को बधनी बाँधो रोग शोक बाँधो दुःख दरिद्र बाँधो
अनेक विषधर बाँधो टोना टामन बाँधो इष्ट भैरो पाँचो पीर बाँधो डायन का मुख बाँधो सामन बहिका बाँधो काली बाँधो देशपति के तेज बाँधो माथा के फन्द बाँधो मैं बाँधो तो बोल सद्गुरु वचन प्रमान गुरु कबीर सिर पर खड़े सब सन्तनके सरदार अजर नाम की रक्षा अजर पुरुष अस्थिर मते चले कबीरके निर्मल भये शरीर सतपुरुष की चौकी सतसुकृत है साथ सत कबीर का अजर शब्द है मेटे सकल विषाद ।
विधि
इस जंजीरा को पानी में ३ बार पढकर भूत पकड़े हुए मनुष्य के मुँह पर छींटा मारे तो भूत भाग जावे।
(3) ।। डायन भूत-प्रेतादि को बाँधने का जंजीरा ।।
बाँधो धरती बाँधो आकाश बाँधा मेर मन्दिर कैलास। बाँधो डायन करे चिकार बाँधो दूत भूत सब किला । अजर नाम मुक्तावे शरीरा येही शब्द से सबको बाँधो सतगुरु सत्त कबीरा।
विधि
यदि किसी मनुष्य को भूत-प्रेत पकड़ा हो या डायन किया हो तो इस जंजीरा से पढ़कर झाड देवे तो आराम हो जावे ।
(4) ।। दूत भूत आदि बाँधने का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
जल बाँधो थल बाँधो पैठ पाताल धर बासुकी नाग बाँधो देवी आदि कुमारी बाँधो लोहे की जहाँ कोठरी रूपे वज्र का पेहान तामें धर बाँधे नही सोधनी भूत-भेत ने करहे का तेरे गुरु की वाचा झूठी मेरे गुरु की वाचा फुरे कहै कबीर निष्फल नहीं जाय सत्त शब्द में रहे समाय सत्त शब्द औ पाँचो बान भाग यमरा दिये पयान रोग राई विषहार टर जाई कंचन अगर शरीर हो जाय सतनाम की परी दोहाई दूतभूत सब बाँध चलाई।
विधि
इस जंजीरा से पढ़कर भूत-प्रेत को बाँध दे तो बंधा रहे, कहीं जाप करे तो उस स्थान पर जल पढ़कर जमीन पर छिड़क दे तो वहाँ तक सर्प आदि कोई जीव आसन के निकट न आ सकेगा।
(5) ।। हथियार तोप बन्दूक आदि बाँधने का जंजीरा ।।
वार बाँधो पार बाँधो बाँधो तुपक ताई तुपक का पलीता बाँधो सत्तनाम की दुहाई अंग बाँधो यम बाँधो धोरे का सवार बाँधो भाला वाले धनुष वाले का हाथ बाँधो सत्नाम की दोहाई लोहे झरे लोहा झरे झर झर परे जंजीर तुपक वान गोला झरे झरे कम न और तीर हाथ खर्ग तृण ना टुटे बत्तीस वान देह नहीं खुटे निज प्रतीति शब्द की आनो सत्तनाम करि हैं रक्षा आकी रंग लोहे की आन झरे बत्तीस खर्ग को धार चौदह यम की हाथ धरो सोहं तार
पुरुष होय रखबार सोहं तार पुरुष रक्षा करें तीर तुपक दूर सब परे हाथ खर्ग गज चक्कर त्रिशूल दीन देवारी सोहं तार पुरुष मोहे लेव उबार सतगुरु केवल कोई ना यमकरि हैं धात यम मारों दूर करों धरो मस्तक पर हाथ उलट आवे पलट जाय काल संघी ताहिं को खाय मारों भूत विडारों काल कलि में जीव करों प्रतिपाल जो कोई करे वोही पर परे पिण्ड प्राण की रक्षा करे साहब बन्दीछोर कबीर ।
विधि
धूरी पर इस जंजीरा को तीन बार पढ़ के फूंक दे तो बन्दूक, भाला, धनुष आदि हथियार बन्ध जावे कुछ भी काम न करे।
(6) ।। यम डायन भूत आदि बाँधने का जंजीरा ।।
बाँधो ब्रह्मा विष्णु मुरारी। जिनके किये सकल संसारी ।।
साहब कबीर रक्षपाल । कहैं कबीर सुनो धर्मदास जंजीरा शब्द करो प्रकाश ।।
विधि
जब किसी को झाड़ने जाँय तब पहले इस जंजीरा को पढ़कर अपनी देह की रक्षा कर लेवें तब मंत्र (मंत्र पढ़ने वाले) पर डाकनी साकनी का गुन चलाया नही लगें प्रेतादि पकड़ा हो तो वह बोलने लगे ।
(8)।। रक्षाबंधन जंजीरा ||
सर काग बीघ बाघ कूकरा मंजार नाग नाहर विषधर घनै कबीर करौं कबीर गुसाई के कबही होय विनाश चाँद जेहैं सूर जैहैं धरनी आकाश सोई वचन कहैं कबीर ने सोई वचन प्रमाण ।
विधि
यदि कहीं बीहड़ या खौफ खतरनाक जगह पर रहने का मौका पड़ जाय तब इस जंजीरा को पढ़कर अपने चारों तरफ घेरा दे दें या पढ़कर जल छिड़क दें तो सर्प-बिच्छू, बाघ, सिंह आदि कोई भी घात न करे या कहीं विकट रास्ता जाने का मौका हो तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो हिंसक पशुओं और सर्प-बिच्छुओं से निर्भय रहे।
(9) ।। भूत भगाने का जंजीरा ।।
जल बाँधों जलाहल बाँधों दुर्गा आदि कुमारी पैठ पताल वासुकि के बाँधों औ बाँधों हनुमान बली लोहेकार वज्जर किवार भूत भागे शब्द की झार जहाँ मेरी दृष्टि परे और सिद्धि के वाचा टरे जाते • सतगुरु रक्षपाल रखवारी ।
विधि
जिसको भूत छूआ हो उसे इस जंजीरा से जल पढ़कर मुँह पर छींटा मारें या वही पानी पिला दें तो भूत भाग जाय ।
(10) ।। दूसरा ।।
कहो जंजीरा मंत्र सुरा बावन लाख अस्थूल शब्द हमारी फिरे संसारा धर्म राय भाखीकर डारा भागो धर्म गयो पताला भागों रावन भागे डायन भागे चुरेलिन देई चिकार मटाया मसान सब भागे नातो शब्द हमारो मान जार बार भस्म कर डारो पर माया अष्टमी भवानी सकत निरंजन निराकर सतपुरुष की आन अजर नाम की फिरि दोहाई दूत भूत सब चले पराई।
विधि
इस जंजीरा से पानी पढ़कर मुँह पर छींटा मारें तो प्रेत चिक्कार मार कर भाग जावे और शेष पानी पिला देवे।
(11) ।। तीसरा ।।
मारों डंडा मारों खण्डा मारों भूत करों नौ खंडा मारों भूत भूत के राजा मारों भूत बजाऊँ बाजा कबीर के हाथ सार की कबीर ठाढ़े काट के छाती आन कुँआँ के पानी आको काटो धरो हाँक परी धर्मदास के निर्मल भये शरीर जापर दया करें कबीर
विधि
कुआँ से एक हाथ से पानी भरकर लावे और उस जल पर इस जंजीरा को तीन बार पढ़ कर रोगी को पिलायें तो भूत तुरंत भाग जाय।
(12) ।। मार्ग रक्षक जंजीरा ।।
घाट बाट औघट बनाऊँ मोंहि धनी के आस मत्थे चले कबीरके भूखन मरुं पियासा बाँधो नाहर नाहरा कूकरा मंजार बाटमों कबीर जंजीरा बावन कसनी सतगुरु कबीर बाँध डार राह करों मैदान चोर न भेटे बाघ न खाय रौंधा सर्प लगे नहिं धाय पाँव तले नाग परे पर हर जाय सत्त कबीर की फिरी दोहाई बावन लाख दगा मिट जाई सत सुकृत कहो मन लाय अग्नि पवन शीतल हो जाय।
विधि
रास्ता चलते चलते सांझ हो जाय और रास्ता में अंधेरा के कारण सर्पभय, बाघभय, चोर प्रेतादि का भय हो तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो सब जीव रास्ता छोड़ कर हट जायेंगे कोई जीव घात नही करेगा, सर्प-बिच्छू भी डंक मार न सकेगा।
(13) ।। दूसरा ।।
कागे कागरो विकार कूकरा मंजार नाग नाहर दूत भूत बट पार सब कहँ बाँधे कबीर गोसाई आन घाट ले डार घाट बाट बन औघटे मोंहि खसम की आस मत्थे चले कबीर के कबहुं होय विनाश।
विधि
रास्ते में यह जंजीरा पढ़ता जाय तो किसी जीव जंतु का भय न हो, कुत्ता, बिलाय बाघ दूत भूत आदि किसी का भय न हो।
(14) ।। तीसरा ।।
बाघ बीघ औकूकरा मंजार नर नाहर विषयादिक मुआ भूतक मसान मलेच्छ बाँधो कबीर गुसाई अंध कूप मे डार घाट बाट बन औघटे मोंहि खसम की आस मत्थे चले कबीर के कबहुं न होय विनाश हाटरी से हाटरी टोट कारी आये अर्मी कुल बलाय टारी मीरा शाह आद अहमद सुल्तान कबीर सत्तर से कुल्लावे की जंजीर कस कस मारे मीरा शाह अहमद सुल्तान कबीर ।
विधि
बन या भयानक रास्ते मे यदि कुबेला हो जाय तो इस जंजीरा को पढ़ता जाय तो बाघ, कुत्ता, बिलार, भूत आदि किसी का भय न हो और न कोई घात करे।
(15) ।। मृगी का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
अजर नाम सबते निज सारा। यह शब्द से जीव उबारा।।
कर्म भर्म भया सबं दूर। सतगुरु शब्द रहा भर पूर । ।
मृतुक रोग मृगी का होई। अजर नाम सो दीन्हा खोई ।।
यह निज शब्द जपे जो साध। मिट गई मृगी रोग असाध ।।
कहैं कबीर प्रतीत हमार । येहि शब्द सो जीव ज्वार ।।
विधि
जिस मनुष्य को मृगी आवे वह मनुष्य इस जंजीरा को प्रातः काल स्नान करके २१ बार पढ़े तो मृगी रोग छूट जाय ।
(16) ।। अधकपारी के दर्द झारने का जंजीरा ।। बावन जंजीरा
कारी छेरी लभथनी हरिहर थोथा खाया हाँक परे कबीर गुसाई वे आधा शीशी जाय ।
विधि
इस जंजीरा को पढ़ता जाय और ललाट को अंगुली से पकड़ कर दबाते हुये अंगुली चलाया जाय, पाँच बार जंजीरा को पढ़कर झारे तो आधे माथे का दर्द आराम हो जाय।
(17) ।। डाढ़ के दर्द व कीड़ा झारने का जंजीरा।। बावन जंजीरा
अरे अरे ग्वानि तु बन जारिन पहर पर्वत से उतरे ग्वालिन फलाने के डाढ़ के कीड़ा मारों जन्म जन्म के कीड़ा टारों ऊँ नमो आदेश गुरु को
विधि
(डाढ़ चौड़े दाँत को कहते हैं) यदि डाढ़ मे दर्द हो या कीड़ा पड़ जाय तो इस जंजीरा से झार दें तो दर्द और कीड़ा आराम हो जाय।
(18) ।। कुत्ता का विष झारने का जंजीरा।।
सप्त खण्ड विकट घाट धार बाँधों सात पके न फूटे पीरा न करे वाचा कबीर गुसाई के फूरे।
विधि
राख पर २१ बार इस जंजीरा को पढ़ के कुत्ता जहाँ काटा हो लगा दें तो आराम हो जाय। और गुड़ पर पढ़ कर दे दें और रोगी को थोड़ा-थोड़ा सात दिनों तक खाने को कहे।
(19) ।। दूसरा जंजीरा ,कुत्ता का विष झारने का जंजीरा।।
कागरो कूकरो उन्दुरो मंजार नर नाहर चोरी करे लंका के उजियार लंकार अस कोट समुद्र ऐसा खाई उतरे विष सत सुकृत दोहाई कबीर इसको खाय ना मरे तो निर्विष हो जाय दोहाई सत्त कबीर गुरु की।
विधि
धुअन और पीपल के पत्ता से झारे, डल्ली धुअन को महीन
पीस कर बुकनी बना ले, सात पत्ता पीपल का लेकर सातों से झारे, हंसुआ को गोइठा (उपलों) के आग में तपावे जब लाल हो जाय तब पत्ता पर थोड़ा थोड़ा धुअन लेकर जहाँ कुत्ता का दाँत गड़ा हो उसी जगह जरा ऊपर अर्थात जखम के ऊपर पीपल के पत्ता पर धुअन को तपाये हँसुआ से घुमावे और जंजीरा (मंत्र) पढ़ता जाय। सात बार एक पत्ता पर पढ़ कर झारें इसी प्रकार सातो पत्तों पर पढ़-पढ़ के झारे तो कुत्ता का विष उत्तर जावे, जखम न होवे।
महत्वपूर्ण सूचना: यह लेख धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं तथा उपलब्ध प्राचीन ग्रंथ/पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इसे चिकित्सा, कानूनी या वैज्ञानिक सलाह के रूप में न लें। किसी बीमारी, विषैले जीव के काटने या आपातकालीन स्थिति में तुरंत योग्य चिकित्सक अथवा आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न. बावन जंजीरा क्या है?
उत्तर: बावन जंजीरा कबीर पंथ की परंपरा से संबंधित 52 जंजीरों और मंत्रों का संग्रह माना जाता है। इस लेख में बावन जंजीरा का परिचय, पारंपरिक पाठ, ध्यान और संबंधित विधि प्रस्तुत की गई है।
प्रश्न. बावन जंजीरा और 52 जंजीरा क्या एक ही हैं?
उत्तर: हाँ, बावन का अर्थ 52 होता है। इसलिए बावन जंजीरा को सामान्य रूप से 52 जंजीरा भी कहा जाता है।
प्रश्न. कबीर जंजीरा मंत्र क्या है?
उत्तर: कबीर जंजीरा मंत्र से आशय कबीर पंथ की परंपरा में वर्णित जंजीरा मंत्रों से है। इस लेख में उपलब्ध पारंपरिक पाठ और उससे संबंधित जानकारी प्रस्तुत की गई है।
प्रश्न. बावन जंजीरा का पाठ किस स्रोत पर आधारित है?
उत्तर: इस लेख में प्रस्तुत बावन जंजीरा का पाठ कबीर साहेब आश्रम से संबंधित एक पुरानी पुस्तक के आधार पर संकलित किया गया है। पाठ को पारंपरिक स्रोत के अनुसार प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
प्रश्न. बावन जंजीरा में कितने जंजीरा होते हैं?
उत्तर: बावन जंजीरा नाम के अनुसार इसमें 52 जंजीरों का उल्लेख किया जाता है। लेख में सभी 52 जंजीरा मंत्रों को क्रमवार प्रस्तुत किया गया है।
प्रश्न. Kabir Janjira Mantra क्या है?
उत्तर: Kabir Janjira Mantra, कबीर जंजीरा मंत्र को Roman Hindi या English में खोजने का एक प्रचलित तरीका है। इस लेख में बावन जंजीरा, 52 जंजीरा और Kabir Janjira Mantra से संबंधित जानकारी उपलब्ध है।