Kabir Ke Dohe | कबीर साहेब जी के 50 अनमोल दोहे। अर्थ सहित

Kabir Ke Dohe: कबीर साहेब जी के 50 प्रसिद्ध और अनमोल दोहे अर्थ सहित पढ़ें। संत कबीर दास के ज्ञान, भक्ति, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षाओं से भरपूर दोहों का संपूर्ण संग्रह हिंदी में।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे 

Kabir Ke Dohe

 

Kabir Ke Dohe | कबीर के दोहे हिंदी में अर्थ सहित

श्वासा की कर सुमिरनो, कर अजपा को जाप।
परम तत्त्व को ध्यान धर , सोऽहं आपे आप ॥

kabir ke dohe

पांच तत्वसे है नहीं , स्वासा नहीं शरीर। 
अन्न अहार करता नहीं , ताका नाम कबीर।। 

अर्थ – कबीर जी कहते है , पांच तत्त्व से मै नहीं बना हूँ , नाही मेरे शरीर में स्वासा है।
अन्न और जल आहार भी नहीं करता, सभी से जो परे है उसी का नाम कबीर हैं।।

नाम लिया तीन सब लिया , सकल वेद का भेद। 
बिना नाम नरके गए , पढ़ी – पड़ी चारो वेद।।

अर्थ: संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने परमात्मा के सच्चे नाम का स्मरण कर लिया, उसने मानो सभी वेदों का सार और रहस्य समझ लिया। केवल वेदों को पढ़ लेने से लाभ नहीं होता। यदि मनुष्य ईश्वर के नाम का जाप और भक्ति नहीं करता, तो चारों वेद पढ़ने के बाद भी उसे आध्यात्मिक कल्याण प्राप्त नहीं होता। इसलिए सच्चे नाम का स्मरण ही मुक्ति और परम ज्ञान का मार्ग है।

साहब से सब होता है , बन्दे से कछु नाहिं। 
राई सो परवत  करे , परवत राई माहिं।।

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि इस संसार में सब कुछ परमात्मा (साहब) की शक्ति से होता है, मनुष्य अपने बल से कुछ भी नहीं कर सकता। परमात्मा चाहे तो एक छोटे से राई के दाने को पर्वत जितना बड़ा बना दे और बड़े से बड़े पर्वत को राई के दाने जितना छोटा कर दे। अर्थात् ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसकी इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं है। इसलिए मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए और सदैव परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिए।

परमात्मा की शक्ति असीम है। वह असंभव को संभव और संभव को असंभव बना सकता है, इसलिए मनुष्य को घमंड छोड़कर ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए।

 
 
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दुर्लभ मनुष्य जनम है देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पति झड़े बहुरि न लागे डार ॥1॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत दुर्लभ और अनमोल होता है। यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जिस प्रकार पेड़ से गिरा हुआ पत्ता दोबारा उसी डाल पर नहीं लग सकता, उसी प्रकार एक बार बीत जाने पर यह मानव जीवन फिर वापस नहीं आता। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का सदुपयोग करते हुए अच्छे कर्म, भक्ति और आत्मकल्याण के कार्य करने चाहिए।
मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। जैसे पेड़ से गिरा पत्ता फिर शाखा से नहीं जुड़ता, वैसे ही यह जीवन बार-बार नहीं मिलता। इसलिए समय का सदुपयोग कर भक्ति और सत्कर्म करने चाहिए।

सच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।
जाके हृदय साँच है ताके हृदय आप॥2॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि सत्य (सच) से बड़ा कोई तप नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस व्यक्ति के हृदय में सच्चाई होती है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा का वास होता है। इसलिए मनुष्य को हमेशा सत्य का पालन करना चाहिए और झूठ से दूर रहना चाहिए।
   सच बोलना और सच्चा जीवन जीना सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति सच्चा होता है, उस पर भगवान की कृपा बनी रहती है।

साई इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय।
मै भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाए॥3॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें केवल उतना ही धन और साधन दें, जिससे उनके परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह हो सके। वे न तो अधिक धन की इच्छा रखते हैं और न ही अभाव में रहना चाहते हैं। उनकी कामना है कि वे स्वयं भी भूखे न रहें और उनके द्वार पर आने वाला कोई साधु-संत या अतिथि भी भूखा न लौटे। इस साखी में संतोष, दया और परोपकार की भावना का संदेश दिया गया है।

माटी कहे कुम्भार से तू क्यों रौदे मोए।
एक दिन ऐसा आएगा मै रौंदूंगी तोए॥4॥

इस साखी में कबीर साहेब जी कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है, “आज तुम मुझे पैरों से रौंदकर घड़ा और बर्तन बना रहे हो, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हारा शरीर इसी मिट्टी में मिल जाएगा और तब मैं तुम्हें रौंदूँगी।”

इस साखी के माध्यम से कबीर साहेब मनुष्य को अहंकार न करने और मृत्यु को सदैव याद रखने की शिक्षा देते हैं। संसार में कोई भी व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली या बड़ा क्यों न हो, अंत में उसे मिट्टी में ही मिल जाना है।

Kabir Ke Dohe

माला फेरत युग गया फिरा ना मनका फेर।
कर का मन डारी दे मन का मनका फेर॥5॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि लोग वर्षों तक हाथों से माला फेरते रहते हैं, लेकिन उनका मन नहीं बदलता। केवल बाहरी पूजा-पाठ करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। यदि सच्ची भक्ति करनी है तो हाथ की माला छोड़कर अपने मन को बदलो, बुरे विचारों को त्यागो और मन को ईश्वर की ओर लगाओ। वास्तविक साधना मन की शुद्धि और आंतरिक परिवर्तन में है, न कि केवल दिखावे की पूजा में।

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए।
माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आय फल होय॥6॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि मनुष्य को धैर्य रखना चाहिए, क्योंकि संसार में हर कार्य अपने समय पर ही पूरा होता है। जैसे माली किसी पेड़ को चाहे सौ घड़े पानी से सींच दे, फिर भी फल तभी लगते हैं जब उनकी उचित ऋतु (मौसम) आती है। उसी प्रकार जीवन में सफलता, ज्ञान और अच्छे परिणाम समय आने पर ही प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें अधीर होने के बजाय धैर्य और निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

क्षीर रूप सतनाम है नीर रूप व्योहार।
हंस रूपी कोई साधुजन है जो शब्द का करत छननहार ॥7॥

अर्थ:
सतनाम दूध के समान शुद्ध और अमूल्य है, जबकि संसार के व्यवहार पानी के समान हैं। जिस प्रकार हंस दूध और पानी के मिश्रण में से केवल दूध ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार सच्चा साधु और विवेकी व्यक्ति सतगुरु के शब्दों का विचार करके उनमें से सत्य ज्ञान को ग्रहण करता है और असत्य बातों को छोड़ देता है।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

 

अकह कहन में कहिये कैसा ।
आदि ब्रह्म जैसा को तैसा ॥8॥

अर्थ:
जिस परमात्मा का वास्तविक स्वरूप शब्दों में बताया ही नहीं जा सकता, उसका वर्णन कैसे किया जाए? आदि ब्रह्म (परम सत्य) जैसा आदि काल से था, आज भी वैसा ही है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता और वह मानव की वाणी तथा बुद्धि से परे है।

Kabir Ke Dohe

        सात समंदर की मसी करूँ लेखनी सब बनराई।
धरती सब कागद करूँ तापर गुरु गुण लिखा न जाय॥9॥

 अर्थ :
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि सातों समुद्रों की स्याही बना दी जाए, जंगल के सभी पेड़ों की कलम बना ली जाए और पूरी धरती को कागज़ बना दिया जाए, तब भी गुरु के गुणों और महिमा का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। गुरु की महिमा इतनी महान और अनंत है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।

संदेश :
इस साखी में कबीर साहेब ने गुरु की महानता का वर्णन किया है। गुरु ही ज्ञान का प्रकाश देकर मनुष्य को अज्ञानता से निकालकर सत्य का मार्ग दिखाते हैं, इसलिए उनके उपकारों का मूल्य कभी चुकाया नहीं जा सकता।

श्वास-श्वास में नाम ले बृथा श्वास मत खोए।
न जाने इस श्वास को आवन होए ना होए॥10॥

 अर्थ :
संत कबीर साहेब कहते हैं कि मनुष्य को अपनी हर सांस के साथ परमात्मा का नाम स्मरण करना चाहिए और जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। किसी को नहीं पता कि जो सांस अभी बाहर गई है, वह वापस आएगी या नहीं। इसलिए जीवन की अनमोल सांसों को संसार के मोह-माया में व्यर्थ न करके ईश्वर भक्ति और अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए।

Kabir Ke Dohe

दस द्वारे का पिंजरा तामे पंछी पौन।
रहने को अचरज नहीं जात अचम्भा कौन॥11॥

 अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर दस द्वारों (दो आंखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, मुख, गुदा और जननेंद्रिय) वाला एक पिंजरा है, जिसमें प्राण रूपी पक्षी (आत्मा) निवास करता है। इस शरीर में आत्मा का रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन जब यह आत्मा शरीर छोड़कर चली जाती है, तब यह सबसे बड़ा आश्चर्य होता है कि वह कहाँ चली गई और उसका क्या हुआ।

इस साखी के माध्यम से कबीर साहेब मानव जीवन की नश्वरता और आत्मा के रहस्य को समझाने का प्रयास करते हैं।

भावार्थ:
मनुष्य को अपने शरीर और सांसारिक मोह में अधिक आसक्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक दिन आत्मा इस शरीर को छोड़कर चली जाएगी। इसलिए जीवन का उपयोग ईश्वर भक्ति और सत्कर्मों में करना चाहिए।

मात पितु गुरु करहिं ना सेवा चारो ओर फिरत पूजत है देवा।
ते नर के काल नचावे आशा दे दे मुआवे॥12॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि जो लोग अपने माता-पिता और गुरु की सेवा नहीं करते, लेकिन चारों ओर घूम-घूमकर देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वे सच्चे धर्म के मार्ग पर नहीं हैं। ऐसे लोग संसार की आशाओं और इच्छाओं में फँसे रहते हैं। काल (मृत्यु) उन्हें तरह-तरह की उम्मीदें देकर जीवन भर नचाता रहता है और अंत में वे बिना परम सत्य को प्राप्त किए ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

संदेश:
माता-पिता और गुरु की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। केवल बाहरी पूजा करने से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करने और सच्चे ज्ञान को अपनाने से जीवन सफल होता है।

Kabir Ke Dohe 

कथनी अति गुण सी करनी विष की लोए।
कथनी तजि करनी करो तो विष से अमृत होए॥13॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि केवल अच्छी-अच्छी बातें करना आसान है, लेकिन उन बातों को अपने जीवन में अपनाना कठिन होता है। यदि व्यक्ति सिर्फ उपदेश देता रहे और स्वयं उसका पालन न करे, तो उसकी बातें विष के समान हानिकारक हो जाती हैं। लेकिन यदि वह केवल कहने के बजाय अच्छे कर्म करना शुरू कर दे, तो वही विष अमृत के समान लाभदायक बन जाता है। इसलिए मनुष्य को कथनी से अधिक करनी पर ध्यान देना चाहिए।

गुरु को कीजे बंदगी कोटि-कोटि प्रणाम ।
किट ना जाने भृंग को वह ( गुरु ) कर लीजिए आप सामान ॥ 14॥

अर्थ:
इस साखी में कबीर साहेब जी गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि गुरु को करोड़ों बार प्रणाम करना चाहिए। जिस प्रकार भृंग (एक प्रकार का कीट) अपने ध्यान और प्रभाव से साधारण कीड़े को अपने समान बना देता है, उसी प्रकार सद्गुरु भी अपने ज्ञान, कृपा और उपदेश से अज्ञानी जीव को अपने समान ज्ञानवान और आत्मिक रूप से श्रेष्ठ बना देते हैं। इसलिए गुरु का स्थान अत्यंत महान और पूजनीय है।

गुरु को बार-बार प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि वे अपनी कृपा और ज्ञान से साधारण मनुष्य को भी महान बना देते हैं। जैसे भृंग कीड़े को अपने समान बना देता है, वैसे ही गुरु शिष्य को ऊँचा उठाकर आत्मज्ञान प्रदान करते हैं।

Kabir Ke Dohe

जगत जनायो जिन्ही सकल सो गुरु प्रगटे आय ।
जिन गुरु आँखिन देखियाँ सो गुरु दिया लखाय ॥ 15॥

 अर्थ :
संत कबीरदास जी कहते हैं कि जिस पूर्ण गुरु ने सम्पूर्ण संसार को उत्पन्न करने वाले परमात्मा का साक्षात् दर्शन किया है, वही सच्चा गुरु संसार में प्रकट होकर आता है। ऐसा गुरु अपने शिष्यों को भी उस परम सत्य और परमात्मा का ज्ञान कराता है, जिसे उसने स्वयं अपनी अनुभूति से देखा और जाना है।

अर्थात् सच्चा गुरु केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देता, बल्कि स्वयं परमात्मा का अनुभव करके अपने शिष्यों को भी उस दिव्य मार्ग का परिचय कराता है।

Kabir Ke Dohe

भली भई जो गुरु मिला नातर होती हानि।
दीपक ज्योति पतंग ज्यों पड़तयो पूरा जनि॥ 16॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि यह बहुत अच्छा हुआ कि मुझे सच्चे गुरु मिल गए, नहीं तो मेरा बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। जिस प्रकार पतंगा दीपक की लौ को देखकर उसकी ओर आकर्षित होकर उसमें गिर जाता है और जलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार गुरु के ज्ञान के बिना मनुष्य भी संसार के मोह-माया में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ कर देता है। गुरु ही सही मार्ग दिखाकर जीव को पतन से बचाते हैं।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के 50 अनमोल दोहे 

भली भई जो गुरु मिला जासो पाया ज्ञान ।
घही माहि चबूतरा घटही माहिं दिवान ॥ 17॥

अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि यह बहुत अच्छा हुआ कि मुझे सच्चे गुरु मिल गए, जिनसे मुझे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। गुरु के ज्ञान से मुझे पता चला कि जिस परमात्मा को लोग बाहर मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में खोजते हैं, वह वास्तव में हमारे अपने शरीर (घट) के भीतर ही विराजमान है। हमारे हृदय रूपी शरीर में ही उसका सिंहासन (चबूतरा) और दरबार (दिवान) लगा हुआ है। इसलिए ईश्वर को बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने का प्रयास करना चाहिए।

ज्ञान प्रकाशी गुरु मिला सोजन बिसरि न जाय।
जब गोविन्द कृपा करी तब गुरु मिलिया आय ॥ 18 ॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि जब हमें ऐसा सद्गुरु मिल जाता है जो अज्ञानता के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देता है, तो उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। ऐसा गुरु हमें तभी मिलता है जब भगवान (गोविन्द) की विशेष कृपा होती है। ईश्वर की कृपा के बिना सच्चे ज्ञान देने वाले गुरु की प्राप्ति संभव नहीं है।

भावार्थ :
सद्गुरु का मिलना भगवान की कृपा का परिणाम है। सद्गुरु हमें सही मार्ग दिखाकर आत्मज्ञान प्रदान करते हैं, इसलिए उनका सम्मान और स्मरण हमेशा करना चाहिए।

गुरु गोविन्द कर जानिये रहिये शब्द समाय ।
मिले तो दण्डवत बन्दगी पल २ ध्यान लगाय ॥ 19 ॥

 अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु को ही परमात्मा (गोविंद) का स्वरूप समझना चाहिए और उनके बताए हुए सत्-शब्द (सच्चे ज्ञान) में सदैव लीन रहना चाहिए। जब भी गुरु का दर्शन हो, तो उन्हें दण्डवत प्रणाम करके श्रद्धापूर्वक वंदना करनी चाहिए तथा हर पल उनके उपदेशों और परमात्मा के नाम का ध्यान करना चाहिए।

भावार्थ :
मनुष्य को अपने गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और सम्मान रखना चाहिए। गुरु के ज्ञान और उपदेशों को जीवन में अपनाकर निरंतर ईश्वर का स्मरण करना ही सच्ची भक्ति है।

गुरु गोविन्द तो एक हैं दूजा सब आकार ।
आपा मेटे हरि भजै तब पावै करतार ॥ 20॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि सच्चे गुरु और परमात्मा (गोविन्द) वास्तव में एक ही हैं। संसार में दिखाई देने वाली बाकी सभी वस्तुएँ केवल नश्वर रूप और आकार हैं। जब मनुष्य अपने अहंकार, अभिमान और ‘मैं’ की भावना को मिटाकर परमात्मा का भजन करता है, तभी वह सृष्टि के रचयिता परमेश्वर (करतार) को प्राप्त कर सकता है।

संदेश:
इस साखी में कबीर साहेब ने अहंकार त्यागने, गुरु की महिमा समझने और सच्ची भक्ति के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया है।

चकवी बिछुड़ी रैन की आन मिली प्रभात।
जो जन बिछुड़े नाम से दिवस मिले न रात ॥ 21 ॥

 अर्थ :
चकवी पक्षी रात भर अपने साथी से बिछुड़ी रहती है, लेकिन सुबह होते ही उससे मिल जाती है। परंतु जो मनुष्य भगवान के नाम (स्मरण) से दूर हो जाता है, उसे न दिन में शांति मिलती है और न रात में। वह हर समय बेचैन और दुखी रहता है।

संत कबीर दास जी इस साखी के माध्यम से बताते हैं कि ईश्वर का नाम ही सच्चा सुख और शांति प्रदान करता है। जो व्यक्ति भगवान के नाम से जुड़ा रहता है, उसका जीवन आनंदमय रहता है, जबकि नाम से दूर रहने वाला व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है।

कहना था सो कह चला अब कछु कहा न जाय।
एक आया दूजा गया दरिया लहर समाय ॥ 22 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि जो सत्य और ज्ञान मुझे कहना था, वह मैं कह चुका हूँ। अब इसके आगे कुछ भी कहने योग्य नहीं बचा है। इस संसार में जो भी आता है, उसे एक दिन जाना ही पड़ता है। जैसे नदी की लहर उठती है और फिर उसी नदी में विलीन हो जाती है, वैसे ही जीव इस संसार में आकर अंत में परमात्मा में समा जाता है।

भावार्थ:
यह साखी जीवन की नश्वरता और आत्मा के परमात्मा में विलय होने का संदेश देती है। मनुष्य को अहंकार छोड़कर सत्य और ईश्वर की भक्ति में लगना चाहिए, क्योंकि अंततः सब कुछ उसी परम सत्ता में समा जाता है।

बूडा था पर ऊबरा गुरुकी लहरि चमक ।
वेरा देखा झांझरा उतरि भया फरक॥ 23॥

सरल हिंदी अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि मैं अज्ञान और संसार रूपी गहरे समुद्र में डूब रहा था, लेकिन गुरु की कृपा और ज्ञान की चमक ने मुझे बचा लिया। जब मैंने अपने भीतर झाँककर सत्य को देखा, तब मेरे मन के सभी भ्रम और अज्ञान दूर हो गए। इसके बाद मैं संसार के मोह-माया से अलग होकर आत्मिक शांति और सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सका।

भावार्थ:
सद्गुरु की कृपा से मनुष्य अज्ञान, मोह और सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सत्य और आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है।

पहिले दाता शिष्य भये तन मन अरप्यो शीश ।
पाछे दाता गुरु भये नाम दियो बखशीश ॥ 24 ॥

अर्थ:
संत कबीर साहेब कहते हैं कि पहले शिष्य ने अपना तन, मन और सिर (अर्थात् अपना सर्वस्व) गुरु को समर्पित कर दिया। जब शिष्य ने पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और समर्पण दिखाया, तब गुरु दाता बन गए और कृपा करके उसे नाम रूपी अमूल्य बख्शीश प्रदान की।

इस साखी का संदेश है कि जब साधक अहंकार छोड़कर पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ गुरु की शरण में जाता है, तब गुरु उस पर कृपा करके आध्यात्मिक ज्ञान और नामदान का अनमोल उपहार देते हैं।

Kabir Ke Dohe

राम नामके पटतरे देवे को कछु नाहिं।
क्या ले गुरु संतोषिये हवस रही मनमाहिं ॥ 25 ॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु ने मुझे राम-नाम जैसा अमूल्य खजाना दिया है, लेकिन मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं सोचता हूँ कि ऐसी कौन-सी वस्तु गुरु को अर्पित करूँ जिससे वे संतुष्ट हो जाएँ। मेरे मन में यही इच्छा बनी रहती है कि मैं अपने गुरु का ऋण कैसे चुका सकूँ।

भावार्थ:
सच्चे गुरु का उपकार इतना महान होता है कि संसार की कोई भी वस्तु उसके बराबर नहीं हो सकती। इसलिए शिष्य के मन में हमेशा गुरु के प्रति कृतज्ञता और सेवा की भावना बनी रहती है।

निज मन तो नीचा किया चरण कमलकी ठौर |
कहैं कबीर गुरुदेव बिन नजर न आवै और ॥ 26 ॥

अर्थ :
कबीर साहेब कहते हैं कि मैंने अपने मन के अहंकार और अभिमान को त्यागकर उसे गुरु के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है। अब मेरे लिए गुरु ही सब कुछ हैं। गुरुदेव के अलावा मुझे कोई अन्य दिखाई नहीं देता, क्योंकि गुरु की कृपा से ही परम सत्य और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है।

भावार्थ :
इस साखी में कबीर साहेब गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जब साधक अपना अहंकार छोड़कर पूरी श्रद्धा से गुरु की शरण में चला जाता है, तब उसकी दृष्टि में गुरु ही सर्वोपरि हो जाते हैं। गुरु ही उसे ईश्वर तक पहुँचाने वाले मार्गदर्शक होते हैं।

मन दिया तिन सब दिया मनके लार शरीर ।
अब देवेको कछु नहीं यों कथि कहे कबीर ॥ 27 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने अपना मन, प्रेम और समर्पण परमात्मा को अर्पित कर दिया, उसने मानो अपना सब कुछ दे दिया। मन के साथ शरीर भी उसी के अधीन हो जाता है। इसके बाद देने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता। इसलिए कबीर कहते हैं कि सच्चा समर्पण मन का समर्पण है, क्योंकि मन दे देने पर सब कुछ स्वतः ही अर्पित हो जाता है।

संक्षिप्त अर्थ:
जिस व्यक्ति ने अपना मन भगवान को समर्पित कर दिया, उसने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। उसके बाद देने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रहता। यही पूर्ण भक्ति और समर्पण का स्वरूप है।

तन मन दिया तो भल किया शिरका जासी भार ।
कबहूँ कहै कि मैं दिया घनी सहैगा मार ॥ 28॥

 अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि यदि आपने अपना तन, मन और सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर दिया है, तो यह बहुत अच्छा किया है क्योंकि इससे अहंकार और सांसारिक बोझ समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि समर्पण करने के बाद भी मन में यह भाव रहे कि “मैंने इतना दान किया” या “मैंने अपना सब कुछ दे दिया”, तो यह अहंकार है। ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग में अनेक कष्ट और ठोकरें खाता है।

गुरु सिकलीगर कीजिये मनहिं मस्कला देइ ।
मनका मैल छुडाइके चित दर्पण करि लेइ ॥ 29॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि हमें ऐसा गुरु बनाना चाहिए जो सिकलीगर (लोहे को घिसकर चमकाने वाला कारीगर) की तरह हमारे मन को ज्ञान और उपदेश की सान पर तेज करे। जैसे सिकलीगर लोहे का जंग और मैल हटाकर उसे चमका देता है, वैसे ही सच्चा गुरु हमारे मन के विकारों, अज्ञान और बुराइयों को दूर करके हमारे चित्त को दर्पण की तरह निर्मल और स्वच्छ बना देता है।

भावार्थ:
सच्चा गुरु मनुष्य के मन से अज्ञान और बुराइयों को दूर कर उसे पवित्र, निर्मल और ज्ञानवान बनाता है।

गुरु धोबी शिष कापडा साबुन सिरजनहार ।
सुरति शिला पर धोइये निकसै ज्योति अपार ॥ 30 ॥

अर्थ:
संत कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु धोबी के समान हैं और शिष्य कपड़े के समान है। परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान साबुन की तरह है। जब गुरु शिष्य के मन को ध्यान और सत्संग रूपी पत्थर पर धोते हैं, तब उसके भीतर के अज्ञान, विकार और बुराइयाँ दूर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप उसके अंदर छिपी हुई दिव्य ज्योति और आत्मज्ञान प्रकट हो जाता है।

भावार्थ:
सच्चे गुरु की शिक्षा और सत्संग से मनुष्य का जीवन निर्मल हो जाता है तथा उसके भीतर ईश्वर का प्रकाश प्रकट होने लगता है।

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

Kabir Ke Dohe

गुरु कुलाल शिष्य कुम्भ हैं, गढ गढ काढै खोट ।
अन्तर हाथ सहार दै बाहर बाहे चोट ॥ 32 ॥

अर्थ:
कबीर साहेब कहते हैं कि गुरु कुम्हार के समान होता है और शिष्य मिट्टी के घड़े के समान। जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाते समय उसकी कमियों को दूर करने के लिए बाहर से थपकी देता है और अंदर से सहारा भी देता है, उसी प्रकार गुरु अपने शिष्य के दोषों और बुराइयों को दूर करने के लिए उसे अनुशासन और शिक्षा देता है। गुरु बाहर से कठोर दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके हृदय में शिष्य के प्रति प्रेम, करुणा और कल्याण की भावना होती है। गुरु का उद्देश्य शिष्य को योग्य, ज्ञानवान और श्रेष्ठ मनुष्य बनाना होता है।

ज्ञान समागम प्रेम सुख दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइये सतगुरु चरण निवास ॥ 33 ॥

गुरु मानुष करि जानते ते नर कहिये अन्ध ।
यहां दुखी संसारमें आगे यमके बन्ध ॥ 34 ॥

गुरुको मानुष जानते चरणामृत सो पानि ।
ते नर नरके जायँगे जन्म जन्म श्वानि ॥ 35 ॥

Kabir Ke Dohe

सुखिया सब संसार है खाये और सोए।
दुखिया दास कबीर है जागे और रोए  ॥36॥

गुरु हैं बडे गोविन्द ते मनमें देख विचार |
हरि सुमरै सो वार है गुरु सुमरे सो पार ॥ 37 ॥

गुरु सीढ़ी ते ऊतरै शब्द बिहूना होय।
ताको काल घसीटि हैं राखि सकै नहिं कोय || 38 ||

अहम अग्नि निशि दिन जरे गुरु सोचा है मान ।
ताको यम नेवता दियो होहु हमार मेहमान ॥ 39 ॥

गुरु पारस गुरु परस है चन्दन बास सुबास |
सतगुरु पारस जीवको दीना मुक्ति निवास ॥ 40 ॥

Kabir Ke Dohe : संत कबीर दास जी के दोहे

गुरु सो भेद जो लीजिये शीश दीजिये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये गखि जीव अभिमान ॥ 41 ॥

Kabir Ke Dohe

जब मै था तब हरी नहीं अब हरी है मै नाहीं।
सब अधियारा मिट गया जब दीपक देखा माहि ॥ 42 ॥

कबीर साहेब कहते है – जब मुझ में हम रूपी अहंकार था , तब हरी ( परमत्मा ) मुझ से दूर थे , जब अहंकार को छोड़ा तब हरी मिले , और सब अज्ञानता मिट गया जब अंदर में ज्ञान रूपी प्रकाश को देखा।

गुरु बतावै साधुको साधु कहै गुरु पूज ।
अरस परसके खेलमें भई अगमकी सूज ॥ 43 ॥

यम गरजे बल बाघके कहै कबीर पुकार।
गुरू कृपा ना होत जो तौ यम खाता फार ॥ 44 ॥

अवर्ण वरण अमूर्ति जो कहौं ताहि किन पेख ।
गुरू दयाते पावई सुरति निरति करि देख ॥ 45 ॥

Kabir Ke Dohe

यह धन जो गुरुकी अहै भाग बडे जिन पाय ।
कह कबीर टोटा नहीं जब परे तबहि लखाय ॥46॥

कह कवीर दरगाह सो जेहि उतरी है भार ।
सोइ करै गुरुआइया झकि २ मरे गँवार ॥ 47 ॥

पंडित पढि गुनि पचि मुये गुरु बिन मिलै न ज्ञान ।
ज्ञान बिना नहि मुक्ति है सत्य शब्द प्रमान ॥ 48 ॥

मूल ध्यान गुरु रूप है मूल पूजा गुरु पाव।
मृलनाम गुरु बचनहै सत्य मूल सत भाव॥ 49॥

कबीर साहेब कहते है – वास्तविक ध्यान गुरु का स्वरुप है जो अभ्यास के समय अंदर में देखा जाये , वास्तविक पूजा गुरु चरण है , वास्तविक नाम गुरु के बचन है जो नाम गुरु ने बताया उसी से उधार होगा , सच्चे लगन से गुरु भक्ति यही मुक्ति का आधार है।

Kabir Ke Dohe

जीवन यौवन राजमद अविचल रहा न कोई।
जा दिन जाये सत्संग में जीवन का फल सोए॥ 50॥

कबीर साहेब कहते है – जीवन जवानी धन सम्पति ये सदा नहीं रहता , और ये जीवन का फल भी नहीं है , जिस दिन आप सत्संग में जाते है वही जीवन का फल है।

अगर दो कहूं तो वो मिथ्या होगा , ये जीवात्मा जब परब्रह्म सत्यपुरुष में समां जायेगा तब जैसे सत्यपुरुष है वैसा ही ये जीवात्मा भी हो जायेगा।। 

 

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